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________________ ५ प्रस्तावना अनु कसा पाहुडके १५ अधिकारों में से प्रारम्भके ६ अधिकारोंमें कर्मों के प्रकृति, स्थिति, भाग और प्रदेश सम्बन्धी बन्ध, उदय, उदीरणा, सत्त्व और संक्रमणका जो वर्णन किया गया है, उस सबका आधार महाकम्मपयडिपाहुड है और यतः गुणधराचार्य के समय में महाकम्मपयडिपाहुडका पठन-पाठन बहुत अच्छी तरह प्रचलित था, अत उन्होंने प्रारम्भके ५ अधिकारों पर कुछ भी न कहकर उक्त अधिकारों के विषय से सम्बन्ध रखनेवाले विषयोंके पृच्छारूप तीन ही गाथासूत्रों को कहा । यह एक ऐसा सबल प्रमाण है, कि जिससे कसायपाहुडका षट्खंडागमसे पूर्ववर्तित्व स्वतः सिद्ध होता है । आगे चूर्णिसूत्रों के ऊपर विचार करते समय इस विषय पर विशद प्रकाश डाला जायगा । गुणधर और धरसेन दि० परम्परा में जो आचार्य श्रुत- प्रतिष्ठापक के रूपमे ख्याति प्राप्त हैं उनमें आचार्य गुणधर और ० धरसेन प्रधान हैं। आ० धरसेनको द्वितीय पूर्व-गत पेज्जढोसपाहुडका ज्ञान प्राप्त था, और आ० गुणधरको पचम पूर्व-गत पेज्जदोसपाहुडका ज्ञान प्राप्त था । इस दृष्टिसे निम्न अर्थ फलित होते हैं १ - श्र० धरसेनकी अपेक्षा श्र० गुणधर विशिष्ट ज्ञानी थे । उन्हें पेज्जदोसपा हुडके अतिरिक्त महाकम्मपयडिपाहुडका भी ज्ञान प्राप्त था, जिसका साक्षी प्रस्तुत कसायपाहुड ही है, जिसमें कि महाकम्मपयडिपाहुडसे सम्बन्ध रखने वाले विभक्ति, बन्ध, संक्रमण और उदय, उदीरणा जैसे पृथक् अधिकार दिये गये हैं । ये अधिकार महाकम्मपय डिपाहुडके २४ अनुयोगद्वारोंमेंसे क्रमशः छठे, बारहवें और दशवें अनुयोगद्वारोंसे सम्बद्ध है । महाकम्मपय डिपाहुडका चौबीसवाँ अल्पबहुत्व नामक अनुयोगद्वार भी कसायपाहुडके सभी अर्थाधिकारोंमे व्याप्त है । इससे सिद्ध होता है कि आ० गुणधर महाकम्मपयडिपाहुडके ज्ञाता होने के साथ पेज्जदोसपाहुड-के ज्ञाता और कसायपाहुडके रूपमें उसके उपसंहारकर्ता भी थे । इसके विपरीत ऐसा कोई भी सूत्र उपलब्ध नहीं है, जिससे कि यह सिद्ध हो सके कि ० धरसेन पेज्जदोसपाहुडके भी ज्ञाता थे । २ - ० धरसेनने स्वय किसी ग्रन्थका उपसहार या निर्माण नहीं किया है, जबकि श्र० गुणधरने प्रस्तुत ग्रन्थ में पेज्जदोसपाहुडका उपसंहार किया है । अतएव श्र० धरसेन जय वाचकप्रवर सिद्ध होते हैं, तब श्र० गुणधर सूत्रकारके रूपमें सामने आते हैं । ३ - श्र० गुणधरकी प्रस्तुत रचनाका जब हम पट्खडागम, कम्मपयडी, सतक और सित्तरी आदि कर्म-विषयक प्राचीन ग्रन्थोंसे तुलना करते है, तब श्र० गुणधर की रचना अतिसंक्षिप्त, असंदिग्ध, बीजपद युक्त, गह्न और सारवान् पदोंसे निर्मित पाते हैं, जिससे कि उनके सूत्रकार होने से कोई संदेह नहीं रहता । यही कारण है कि जयधवलाकारने उनकी प्रत्येक गाथा को सूत्रगाथा और उसे अनन्त अर्थसे गर्भित बतलाया है । कर्मोंके सक्रमण, उत्कर्षण, अपकर्षणादि विषयक प्रतिगहन तत्त्वका इतना सुगम प्रतिपादन अन्य किसी ग्रन्थमें देखनेको नहीं मिलता । इस प्रकार आ० गुणधर आ० धरसेनकी अपेक्षा पूर्ववर्ती और ज्ञानी सिद्ध होते हैं । पुष्पदन्त और भूतबलि आ० धरसेन- उपदिष्ट महाकम्मपयडिपाहुडका आश्रय लेकर उसपर पटूखंडागम सूत्रोंके रचयिता भगवन्त पुष्पदन्त और भूतबलि हुए हैं । यद्यपि कसायपाहुडकी रचना के अत्यन्त संक्षिप्त और गाथासूत्ररूप होने से गद्यसूत्रों में रचित और विस्तृत परिमाणवाले पटूखंडागम के साथ उसकी तुलना करना सभव नहीं है, तथापि सूक्ष्मदृष्टिसे दोनों ग्रन्थों के अवलोकन करने पर ۱
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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