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________________ कसायपाहुडसुत्त कि मेरे द्वारा प्रयत्नपूर्वक सावधानी रखने पर भी जो कुछ भूल रह गई हो, उसे दृष्टिवादके ज्ञाता आचार्य शुद्ध करें ।। कसायपाहुडका षट्खंडागमसे पूर्ववर्तित्व श्रा० धरसेनसे महाकम्मपयडिपाहुडका ज्ञान प्राप्त करके पुष्पदन्त और भूतबलिने जो ग्रन्थ-रचना की, वह षट्खंडागम नामसे प्रसिद्ध है। यह रचना किसी एक पूर्व या उसके किसी एक पाहुड पर अवलम्बित न होकर उसके विभिन्न अनुयोगद्वारोंके आधार पर रची गई है, इसलिए वह खंड-आगम कहलाती है। पर कसायपाहुडकी रचना ज्ञानप्रवादपूर्वके पेजदोसपाहुडकी उपसंहारात्मक होने पर भी मौलिक, अखंड, अविकल एवं सर्वाङ्ग है। ऐसा प्रतीत होता है कि कसायपाहुडकी गाथा-निवद्ध यह रचना आगमाभ्यासियोंको कण्ठस्थ करनेके लिए की गई थी। इस रचनामें कितनी ही गाथाएँ वीजपद-स्वरूप हैं, जिनके कि अर्थका व्याख्यान वाचकाचार्य, व्याख्यानाचार्य या उच्चारणाचार्य करते थे । यही कारण है कि कसायपाहुडकी रचना होने के बाद कितनी ही पीढ़ियो तक उसका पठन-पाठन मौखिक ही चलता रहा और और उसके लिपिबद्ध या पुस्तकारूढ होनेका अवसर ही नहीं आया। इस बात की पुष्टि जयधवलाकारके निम्न-लिखित वाक्योंसे भी होती है"' "पुणो ताओ चेव सुत्तगाहाम्रो पाइरियपरंपराए आगच्छमाणीओ अज्जमंखणागहत्थीणं पत्ताओ । पुणो तेसिं दोण्हं पि पादमूले असीदिसदगाहाणं गुणहरमुहकमलविणिग्गयाणमत्थं सम्मं सोऊण जयिवसहभडारएण पवयणवच्छलेण चुण्णिसुत्तं कयं ।" - (जयध० भा० १ पृ०६८) अर्थात् गुणधराचार्यके द्वारा १८० गाथाओंमें कसायपाहुडका उपसंहार कर दिये जाने पर वे ही सूत्र-गाथाएँ आचार्यपरम्परासे आती हुई आर्यमंच और नागहस्तीको प्राप्त हुई। पुनः उन दोनों ही प्राचार्योंके पादमूलमे बैठकर उनके द्वारा गुणधराचार्यके मुखकमलसे निकली हुई उन एक सौ अस्सी गाथाओंके अर्थको भले प्रकारसे श्रवण करके प्रवचन के वात्सलसे प्रेरित होकर यतिवृपभ भट्टारकने उनपर चूर्णिसूत्रोंकी रचना की। इस उद्धरणमें 'आइरियपरंपराए आगच्छमाणीओ' और 'सोऊण' ये दो पद - बहुत ही महत्वपूर्ण हैं और उनसे दो बातें फलित होती है-एक तो यह है कि उक्त गाथाएँ आर्यमंच और नागहस्तीको प्राप्त होने के समय तक लिपिवद्ध नहीं हुई थीं, उन्हे मौखिक पर• म्परासे ही प्राप्त हुई थीं। दूसरी यह है कि गुणधरका समय आर्यमंतु और नागहस्तीसे इतना अधिक पूर्वकालिक है कि वीचमे आचार्यों की अनेक पीढ़ियाँ बीत चुकी थीं। + इय कम्मप्पगडीयो जहा सुय नीयमप्पमइणा वि । सोहियणाभोगकय कहतु वरदिट्ठिवायन्नू ॥ ( कम्मपयडी) बंधविहारणसमासो रइयो अप्पसुयमदमइणा उ । त वधमोक्खणिउणा पूरेऊण परिकहेति ॥ १०५ ॥ ( सतक ) जो जत्य अपडिपुन्नो अत्यो अप्पागमेण बद्धो त्ति । त समिऊरण बहुसुया पूरेऊरण परिकहिंतु ।। ७१ ॥ (मित्तरी) - पूर्वकालमें पठन-पाठनकी यह पद्धति थी कि पहले मूल मूत्रोंका उच्चारण कराया जाता था और "पोछे उनके अयंका व्याम्यान किया जाता था । वेदोके भी पठन-पाठनकी यही पद्धति रही है।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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