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________________ १८६ कसाय पाहुड सुत्त [५ प्रदेशविभक्ति वि तेणेव जम्मि सम्मामिच्छत्तं सम्मत्ते पक्खित्तं तस्स सम्मत्तस्स उक्कस्सपदेससंतकम्म । १०. णव॒सयवेदस्स उकस्सयं पदेससंतकम्मं कस्स ? ११. गुणिदकम्मंसिओ ईसाणं गदो तस्स चरिमसमयदेवस्स उक्कस्सयं पदेससंतकम्मं । १२, इत्थिवेदस्स उकस्सयं पदेससंतकम्म कस्स ? १३. गुणिदकम्मंसिओ असंखेज्जवस्साउए गदो तम्मि पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागेण जम्हि पूरिदो तस्स इत्थिवेदस्स उक्कस्सयं पदेससंतकम्मं । १४. पुरिसवेदस्स उकस्सयं पदेससंतकम्म कस्स ? १५. गुणिदकम्मंसिओ ईसाणेसु णसयवेदं पूरेदूण तदो कमेण असंखेज्जवस्साउएसु उववण्णो । तत्थ पलिदो जिस समय सम्यग्मिथ्यात्वका द्रव्य सर्वसंक्रमणके द्वारा सम्यक्त्वप्रकृतिमे प्रक्षिप्त किया जाता है, उस समय उस जीवके सम्यक्त्वप्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म होता है। नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म किस जीवके होता है ? वही पूर्वोक्त गुणितकर्माशिक सातवीं पृथिवीका नारकी जीव वहाँसे निकलकर तिर्यंच होता हुआ ईशानवर्गमे गया। वहॉपर अतिसंक्लेशसे वह पुनः पुनः नपुंसकवेदको वॉधता है और बहुत कर्मप्रदेशोका संचय करता है । ऐसे उस चरमसमयवर्ती देवके नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म होता है । स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म किस जीवके होता है ? वही पूर्वोक्त गुणितकौशिक जीव ईशानस्वर्गमे नपुंसकवेदके उत्कृष्ट प्रदेशसंचयको करके वहाँसे च्युत हो संख्यात वर्षवाले मनुष्य या तिथंचोमे उत्पन्न होकर तत्पश्चात् असंख्यात वर्पकी आयुवाले भोगभूमियाँ मनुष्य अथवा तिर्यचोमे गया। वहॉपर संक्लेशसे पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमाण कालके द्वारा जिस समय स्त्रीवेद पूरित करता है, उस समय उस जीवके स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म होता है ॥९-१३॥ चूर्णिसू०-पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म किस जीवके होता है ? वही पूर्वोक्त गुणितकांशिक जीव ईशान स्वर्गके देवोमे नपुंसकवेदको पूरित करके तत्पश्चात् संख्यात वर्प १ मिच्छत्ते मीसम्मि य संपक्खित्तम्मि मीससुद्धाणं। (चु.) ततो उव्वहित्तु तिरिएसु उववण्णो । ततो अतोमुहुत्तेण मणुएसु उप्पन्नो । तत्थ सम्मत्त उप्पाएति । ततो लहुमेव खवणाए अन्भुडिओ जम्मि समये मिच्छत्त सम्मामिच्छत्ते सबसकमेण सकत भवति, तम्मि समये सम्मामिच्छत्तस्स उक्कोसपदेससत भवति । जम्मि समये सम्मामिच्छत्त सम्मत्त सव्वसकमेण संकेत भवइ, तम्मि समये सम्मत्तस्स उकोसपदेससंत भवति ।। २ वरिसवरस्स उ ईसाणगस्स चरमम्मि समयम्मि ॥ २८॥ (चू०) सो चेव गुणियकम्मसिगो सव्वावासगाणि काउ ईसाणे उप्पण्णो, तत्य संकिलेसेणं भूयो भूयो नपुंसगवेयमेव बंधति, तत्थ बहुगो पदेसणिचयो भवति, तस्स चरिमसमये वट्टमाणत्स (वरिसवरस्स वर्षवरत्य, नपु सकवेटस्स) उकोसपदेससत । ३ ईसाणे पूरित्ता णqसगं तो असंखवासीसु । पल्लासंखियभागेण पूरिए इस्थिवेयस्स ॥२९॥ (चू०) ईसाणे नपुंसगवेयपुवपउगेण पूरित्ता ततो उयट्टित्तु लहुमेव 'असलवामीसु' ति-भोगभूमिगेसु उप्पण्णो Ixxx तत्य सकिलेसेण परिओयमस्म असखेजेण कालेण इस्थियेउ परितो भवति, तम्मि समये इत्यिवेयस्स उफोसरदेससत । कहं ? भण्णा-पदमसमये वढं, पलिओवमरस अससेजतिमागेण अहापवत्तसंकमेण णिहाति । कम्म० सत्ता० पृ० ५८.
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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