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________________ गा० २२ ] उत्तरप्रकृतिप्रदेशविभक्ति-स्वामित्व-निरूपण १८५ सागरोवमाणि दोभवग्गहणाणि, तत्थ अपच्छिमे तेत्तीसं सागरोवमिए णेरइयभवग्गहणे चरिमसमयणेरड्यस्स तस्स पिच्छत्तस्स उक्कस्सयं पदेससंतकम्म । ६. एवं वारसकसाय-छण्णोकसायाणं । ७. सम्मामिच्छत्तस्स उक्कस्सपदेसविहत्तिओ को होदि ? ८.गुणिदकम्मंसिओ दंसणमोहणीयक्खवओ जम्मि मिच्छत्तं सम्मामिच्छत्ते पक्खित्तं तस्मि सम्मामिच्छत्तस्स उक्करसपदेसविहत्तिओ। ९. सम्मत्तरस सातवी पृथिवीके नारकियोमे उसने दो भवोको ग्रहण किया। उनमेसे सबसे अन्तिम अर्थात् दूसरे तेतीस सागरोपमवाले नारकीके भव-ग्रहण करनेपर चरमसमयवर्ती उस नारकीके मिथ्यात्वकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म होता है ॥३-५॥ चूर्णिसू०-इसी प्रकार अनन्तानुबन्धी आदि बारह कपाय और हास्य आदि छह नोकपाय, इन अठारह प्रकृतियोका प्रदेशसत्कर्मसम्बन्धी उत्कृष्ट स्वामित्व जानना चाहिए । विशेषता केवल इतनी है कि यहॉपर सत्तर कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमाण कर्मस्थिति न कहकर चालीस कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमाण कर्मस्थिति कहना चाहिए । सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिकी उत्कृष्ट प्रदेशविभक्ति करनेवाला कौन जीव है ? गुणितकर्माशिक दर्शनमोहनीय-क्ष्पक जीव जिस समय मिथ्यात्वको सम्यग्मिथ्यात्वमे प्रक्षिप्त करता है, उस समय वह सम्यग्मिथ्यात्वाकृतिकी उत्कृष्ट प्रदेशविभक्तिका स्वामी होता है ।।६-८॥ विशेपार्थ-जिस जीवके मोहनीयकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशसत्त्व विद्यमान होता है, उसे गुणितकर्माशिक कहते है। मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसत्त्व बतलाते हुए अपर जिस जीवके उसका उत्कृष्ट स्वामित्व वतलाया है वही साती पृथिवीका चरमसमयवर्ती नारकी यहॉपर गुणितकर्माशिक शब्दसे अभीष्ट है । वह जीव वहॉसे निकलकर तिर्यचोमे दो तीन भव धारण करके पुनः मनुष्योमे उत्पन्न हुआ। आठ वर्पका होकर उपशमसम्यक्त्वको धारणकर और उपशमसम्यक्त्वके कालके भीतर ही अनन्तानुवन्धी-चतुप्कका विसंयोजन करके उपशमसम्यक्त्वके कालको पूराकर, वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त होकर, और उसमे अन्तर्मुहूर्त रहकर दर्शनमोहनीयका क्षपण प्रारम्भकर अधःकरण और अपूर्वकरणके कालको पूराकर अनिवृत्तिकरणके संख्यात भाग व्यतीत हो जानेपर जिस समय मिथ्यात्वकर्मके अन्तिम खंडकी अन्तिम फालीका सर्वसंक्रमणके द्वारा सम्यग्मिथ्यात्वमे संक्रमण करता है, उस समय सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसत्त्व पाया जाता है। चूर्णिस०-इसी प्रकार सम्यक्त्वप्रकृतिका भी उसी सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशसत्त्ववाले जीवके द्वारा अन्तर्मुहूर्त काल तक संख्यात हजार स्थिति-खंड करने के पश्चान् १संपुग्नगुणियकम्मो पण्सउबरससंतसामी उ ॥ २७ ॥ (चू०) 'सपुरगुणियरम्मो' त्ति-सपुनगुणिकग्मसिगत्तण जन्म अत्यि सो सपुग्नगुणियरम्मो 'पराउप.त्ससवरगमी 'त्ति-उदोउपदेससागी भवति । तत्व वत्ति गैरइयचरमसगये माणता सामप्रोण' बन्याम्माण उदोन पदेनसतसम्म भवति । इम्म सना गा . चुणि० पृ० ५७. २५
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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