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________________ १८४ कसाय पाहुड सुत्त [५ प्रदेशविभक्ति ३. उत्तरपयडिपदेसविहत्तीए एगजीवेण सामित्तं । ४. मिच्छत्तस्स उक्कस्सपदेसविहत्ती कस्स । ५. बादरपुडविजीवेसु कम्मट्ठिदिमच्छिदाउओ, तदो उवट्टिदो तसकाए वे सागरोवमसहस्साणि सादिरेयाणि अच्छिदाउओ, अपच्छिमाणि तेत्तीसं '(२१) प्रदेशविभक्ति-भावप्ररूपणा-इस अनुयोगद्वारमे प्रदेशविभक्तिवाले जीवोके भावोका विचार किया गया है । मोहनीयकर्मकी प्रदेशविभक्तिवाले सभी जीवोके औदयिकभाव होता है। (२२) प्रदेश विभक्ति-अल्पबहुत्वनरूपणा-इस अनुयोगद्दारमे कौके उत्कृष्टअनुत्कृष्ट और जघन्य-अजघन्य प्रदेशविभक्तिवाले जीवाकी अल्पता और अधिकताका अनुगम किया गया है। जैसे-मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट प्रदेशविभक्तिवाले जीव सबसे कम है और इनसे अनुत्कृष्ट प्रदेशविभक्तिवाले जीव अनन्तगुणित हैं । इसी प्रकार मोहनीय कर्मकी जघन्य प्रदेश विभक्तिवाले जीव सबसे कम है और उनसे अजघन्य प्रदेशविभक्तिवाले जीव अनन्तगुणित है। इन बाईस अनुयोगद्वारोके अतिरिक्त भुजाकार, पदनिक्षेप, वृद्धि और स्थान अधिकारोके द्वारा भी प्रदेशावभक्तिका विस्तृत विवेचन उच्चारणावृत्तिमे किया गया है, सो विशेष जिज्ञासुजनोको जयधवला टीकासे जानना चाहिए । चूर्णिसू०-अब उत्तरप्रकृतिप्रदेशविभक्तिका वर्णन करते हैं । उसमे पहले एक जीवकी अपेक्षा प्रदेशविभक्तिका स्वामित्व कहते है-मिथ्यात्वकर्मकी उत्कृष्ट प्रदेशविभक्ति किस जीवके होती है ? जो नीव वादरपृथिवीकायिक जीवोमे बस-स्थितिकालसे कम सत्तरकोडाकोडी सागरोपम कर्म-स्थितिप्रमाण काल तक रहा हुआ है, तत्पश्चात् वहाँसे निकलकर ब्रसकायमे कुछ अधिक दो हजार सागरोपम काल तक रहा, सबसे अन्तमे तेतीस सागरोपमकी आयुवाले १ (२१) पदेसविहत्तिभावपरूवणा-भाव दुविध-जण्णय उक्कस्सय च । उक्कस्से पयद । दुविहो णिद्दे सो-ओघेण आटेसेण य | ओघण अट्टाह कम्माण उक्स्स अणुक्कस्सपदेसबधगा त्ति को भावो? ओदइगो भावो ।XXXजहण्णए पयद । xxxअट्टाह कम्माण जण अजहण्यपदेसबधगा त्ति को भावो? ओदइगो भावो (महाव०)। भाव सम्वत्थ ओदइओ भावो । जयध २ (२२) पदेसविहत्ति-थप्पावहुअपरूवणा-अप्पाबहुअ दुविध जहण्णय उक्करसय चदि । उक्क. स्सए पयद । दुविहो णिसो-ओवेण आदेसेण य । ओषेण सव्वत्थोवो आउग उक्कसपटेसबधी । मोहणीयस्स उक्कस्सपदेसबधो विसेसाहिओ । णामा-गोदाण उक्करसपदेसबंधो दो वि तुल्लो विसेसाहिओ। णाणावरणदसणावरण-अतराइयाण उक्कस्सपटेसबधो तिष्णिवि तुल्लो विसेसाहिओ | वेदाणीयउक्कसपटेसबधो विसेसाहियो । जहण्णए पगद | ओघेण आदेसेण य । ओषेण सव्वत्योवो णामा-गोटाण जहणपदेसबधो । णाणावरण-दसणावरण-अतराइगाणं जहण्णपटेमबधो तिणि वि तुल्ला विसेसाहित्या । मोहणीयत्स जहणपदेसबधो विसेसाहिो । वेदणीयस जहण्णपटेसबधो विसेसाहिओ । आउगजहणपदेसबधो असखेजगुणो (महाब) अपाबहुग दुविह-जहण्णमुक्करम चेदि । उक्स्से पवद | दुविहो णि सो-ओषेण आदेशेण य | ओघेण मोहणीयस्स सव्यत्योवा उक्ऋत्सपढेमवित्तिया जीवा | अणुक्कत्मपदेसविहत्तिया जीवा अ,त गुणा IXxx एव जपणअप्पावहु पि वत्तव । वारे जहण्णाजहणणिमो काययो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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