SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 287
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गा० २२] मूलप्रकृतिप्रदेशविभक्ति-अनुयोगद्वार-निरूपण १८१ '(१३ ) प्रदेशविभक्ति-कालप्ररूपणा-इस अनुयोगद्वारमे एक जीवकी अपेक्षा कर्मोंकी उत्कृष्ट और जवन्य प्रदेशविभक्ति कितने समय तक होती है, इस प्रकारसे कालका निर्णय किया गया है। जैसे-मोहनीयकर्मकी उत्कृष्टप्रदेशविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्टकाल एक समय है। अनुत्कृष्ट प्रदेशविभक्तिका जघन्यकाल वर्पपृथक्त्व और उत्कृष्टकाल असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अनन्तकाल है। जघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्टकाल एक समय है। अजघन्यप्रदेशविभक्तिका काल अनादि-अनन्त और अनादि-सान्त है । (१४ ) प्रदेश विभक्ति-अन्तरप्ररूपणा-इस अनुयोगद्वारमे एक जीवकी अपेक्षा कर्मोंके उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट और जघन्य, अजघन्य प्रदेशोकी विभक्ति करनेवालोके अन्तरकालका विचार किया गया है। जैसे-मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट प्रदेशविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर चूर्णिकारके मतसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमित अनन्त काल है । किन्तु किसी-किसी आचार्यके मतसे जघन्य अन्तर असंख्यात लोक-प्रदेशप्रमित काल है । अनुत्कृष्ट प्रदेशविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल एक समय है। जघन्य और अजघन्य प्रदेशविभक्ति करनेवाले जीवोंका कभी अन्तर नहीं होता है, वे सर्वकाल पाये जाते है। *(१५) नानाजीवापेक्षया भंगविचयनरूपणा-इस अनुयोगद्वारमे नाना जीवोकी १ (१३ ) पदेसविहत्तिकालपरूवणा-काल दुविध-जहाणय उकस्सय च । उकस्सए पगद । दुविहो णिद्देसो-ओषण आटेसैण य । ओघेण xxx मोहणीयस्स उकस्सपटेसबधो केवचिर कालादो होदि १ जहाणेण एगसम्ओ। उक्कस्सेण वे समया। अणुकस्मपदेसवधो जहणेण एगसमओ । उकस्मेण अणतकालमसखेजा पोग्गल्परियहा।xxx जहाणए पगद । दुविदो णिसो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण सत्तण्ह कम्माण जहण्णपदेसवधो केवचिर कालादो होदि ? जहणुकस्तेण एगसमओ। अजहणपदेसवधो केवचिर कालादो होदि ? जहण्णेण मुद्दाभवग्गहण | उकस्सेण असखेजा लोगा। अधवा सेढीए असखेजदिभागो ( महाव०)। कालाणुगमो दुविहो-जहष्णओ उकरसओ चेदि । उकस्से पयद । दुव्हो णिसो ओघेण आदेरण य । ओघेण मोहणीयस्स उकस्सपदेसबधो केवचिर कालादो होटि ? जपणुकस्सेण एगसमओ | अणुकस्सपदे सबधो जहणेण वासपुधत्त । उकस्सेण अणतकालमसखेजा पोग्गलपरियट्टा Ixxx जहण्णए पयद । दुविहो गिद्देसो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण मोहणीयस्स जहण्णपदेसबधो केवचिर कालादो होदि ? जहणुवस्सेण एगसमओ। अजहणपटेसबधो वेवचिर कालादो होटि १ अणादिओ अपजवसिदो, अणादिओ सपज्जवसिदो । जयध० २ (१४) पदेसविहत्ति-अंतरपस्वणा-अतर दुविध-जहण्णय उकसय च । उपत्सए पगद द विहो णिसो-ओवण आदेशेण य । ओषेण अट्ठह कम्माण उकन्सपदेसयधतर केवचिर कालादो होदि १ जहणेण एगसमओ । उकस्सेण अतोमुहुत्त | XXX जहण्णए पगद । दुग्हिो णिद्द सो-ओपेण आदेशेण य । ओघेण अटण्ह कम्माण जहष्ण-अजहष्णपदेसबधतर पत्थि (महाब०)। अतर दुविदजहणमुधम्म चेदि । उपरसे पयद । दुविहो णिसो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण मोहणोयत्न उयन्मपदेगविरत्तीए अतर केवचिर कालादो होदि ? जहण्णुकत्सेण अणतकालमसरोजा पोन्गल्परिवहा । अधवा जण असखेवा लोगा, गुणिदपरिणामेहितो पुधभूदपरिणामेसु अमखेजलोगमत्तेसु जहण गचरणकाल्न अमखेजोगपगाणत्तादो। अणुफ जहष्णुक एगस मओ।xxx जहाणए पयद । तुविदो गिगोओघेण आदेशेण य । ओघेण मोरणीयस्त जहष्णाजहण्णपदेसविरत्तीण णस्यि अतर । जय ३(१५) णाणजीवेहि भंगविचयपरूवणा-णाणाजीवेहि गगविचओ दुविहो-जोडगो
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy