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________________ १८० कसाय पाहुड सुत्त [५ प्रदेशविभक्ति प्रदेशविभक्ति सादि और अध्रुव है । अजघन्य प्रदेशविभक्ति सादि, अनादि, ध्रुव और अध्रुव चारो प्रकारकी है। (१२) एकजीवापेक्षया स्वामित्व-इस अनुयोगद्वारमे कर्मोके उत्कृष्ट और जघन्य प्रदेशाग्रोके स्वामियोका एकजीवकी अपेक्षा विचार किया गया है। जैसे-मोहनीय कर्मकी उत्कृष्ट प्रदेशविभक्तिका स्वामी कौन है ? जो जीव वादर-पृथिवीकायिकोमे साधिक दो हजार सागरोपमसे न्यून कर्मस्थितिप्रमाण काल तक अवस्थित रहा है, वहॉपर उसके पर्याप्तक भव अधिक और अपर्याप्तक भव अल्प हुए। पर्याप्तकाल दीर्घ रहा और अपर्याप्तकाल अल्प रहा । वार-बार उत्कृष्ट योगस्थानोको प्राप्त हुआ और वार-वार अतिसंक्लेश परिणामोको प्राप्त हुआ । इस प्रकार परिभ्रमण करता हुआ वह बादर सकायिक जीवोमे उत्पन्न हुआ । उनमे परिभ्रमण करते हुए उसके पर्याप्तक भव अधिक और अपर्याप्तक भव अल्प हुए। पर्याप्तककाल दीर्घ और अपर्याप्तक-काल ह्रस्व रहा । वहॉपर भी वार-बार उत्कृष्ट योगस्थानोको और अतिसंक्लेशको प्राप्त हुआ । इस प्रकारले संसारमे परिभ्रमण करके वह सातवी पृथिवीके नारकियोंमे तेतीस सागरोपमकी स्थितिका धारक नारकी हुआ । वहाँसे निकलकर वह पंचेन्द्रियोमे उत्पन्न हुआ और वहाँ अन्तर्मुहूर्तमात्र ही रह मरण करके पुनः तेतीस सागरोपम आयुवाले नारकियोंमें उत्पन्न हुआ। वहाँ उस जीवके तेतीस सागरोपम व्यतीत होनेपर अन्तिम अन्तर्मुहूर्त के चरम समयमें वर्तमान होनेपर मोहनीयकर्मकी उत्कृष्टप्रदेशविभक्ति होती है। मोहनीयकर्मकी जघन्य प्रदेशविभक्ति उक्त विधानसे निकलकर अपकश्रेणीपर चढ़े हुए चरमसमयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायसंयतके होती है । धुव-अधुवाणुगमेण दुविहो णिद्देसो-ओवण आदेरेण य । ओघेण मोहणीयस्स उक० अणुक्क० जण० किं सादिया, किमणादिया, किं धुवा, किम वा १ सादि-अधुवा | अज० किं सादिया ४ १ (सादिया) अणादिया धुवा अधुवा वा । जयध० १(१२) एगजीवेण सामित्तचिहत्तिपरूवणा-सामित्त दुविध-जण्णय उकस्सय च । उकस्सए पगदं । दुविहो णिसो-ओघेण आदेसेण य । ओघेणxxx मोहणीयस्स उकस्सप देसबधो कस्स ? अण्णदरस्स चद्गदिवस पचिंदियत्स सण्णिमिच्छादिहित्स वा सम्मादिहिस्स वा, सव्वाहि पजत्तीहि पजत्तयदत्स सत्तविधव धयरस उकस्सजोगिस्स उकस्सए पदेसबधे वट्टमाणगस्स Ixxx जहण्णए पगढ | दुविहो णिद्देसो-ओपेण आदेसेण य । ओषेण सत्तण कम्माण जहण्णओ पदेसवधो कस्स १ अण्णदररस सुहमणिगोटजीवअपनत्तयस्स पढमसमयतब्भवस्थजहणजोगिरस जण्णए पदेसबधे वट्टमाणयत्स (महाव०)। सामित्त दुविह-जहष्णमुकत्स च । उकस्से पयद । दुविहो णिद्द सो-ओषण आदेसेण य | ओघेण मोहणीयस्म उकस्सिया पदेसविहत्ती कस्स ? जो जीवो बाटर पुढविकाइएसु वेहि सागरोवमसहस्सेहि मादिरेएहि अणिय कम्मट्टिदिमच्छिदाउओ० | एव 'वेयणाए' वुत्तविहाणेण ससरिदूण अधो सत्तमाए पुटवीए णेरटएमु तेत्तीस सागरोवमाउछिदिएतु उववण्णो । तदो उवट्टिदसमाणो पचिदिएमु अतोमुहुत्तमच्छिय पुणो तेत्तीसमागरोवमाउटिदिएमु णेरइएतु उववण्णो । पुणो तत्य अपच्छिमतेत्तीससागरोवमाउणिरयभवग्गणअतोमुत्तचरिमममए वट्टमाणस्स मोहणीवस्त उकस्सपदेसविहत्ती Ixxx जहष्णए पयद । दुविदो णिह सो-ओषेण आटेग्ण य | भोवेण मोहणीयत्स जहष्णपदेसविहत्ती कम्स ? जो जीवो मुहमणिगोटजीवेसु पल्दिोवमस्स अमनदिभागेणू णयं फम्मट्टिदिमच्छिदो। एवं 'वेयणाए' वुत्तविणेण चरिमममयकमाई जादो, तन्म मोहणीयन्स जापदेमविहत्ती। जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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