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________________ गा० २२ ] मूलप्रकृतिप्रदेशविभक्ति-अनुयोगद्वार-निरूपण अनुयोगद्वारोमे ' ( २-३ ) सर्वप्रदेशविभक्ति-नो सर्वप्रदेशविभक्ति- इन दोनों क्रमशः कर्मोंके सर्वप्रदेश और नोसर्वप्रदेशोका विचार किया गया है । विवक्षित कर्ममे उसके सर्व प्रदेशोके पाये जानेको सर्वप्रदेशविभक्ति कहते है और उससे कम प्रदेशो के पाये जानेको नोसर्वप्रदेशविभक्ति कहते है । मोहनीयकर्मम ये दोनो प्रकारकी विभक्ति पाई जाती है । (४-५) उत्कृष्ट प्रदेश विभक्ति - अनुत्कृष्टप्रदेशविभक्ति- इन दोनों अनुयोगद्वारोमे क्रमशः कर्मोके उत्कृष्ट प्रदेशका और अनुत्कृष्ट प्रदेशोका विचार किया गया है । जिसमे सर्वोत्कृष्ट प्रदेशाय पाये जाये जाते है, उसे उत्कृष्ट प्रदेशविभक्ति कहते है और जिसमें उत्कृष्ट प्रदेशासे न्यून प्रदेशाय पाये जाते है, उसे अनुत्कृष्ट प्रदेशाप्रविभक्ति कहते है | मोहनीय कर्ममे उत्कृष्ट प्रदेशाय भी पाये जाते है और अनुत्कृष्ट प्रदेशाम भी पाये जाते हैं । १७९ 3 * ( ६-७ ) जघन्य प्रदेशविभक्ति - अजघन्य प्रदेशविभक्ति- इन दोनो अनुयोगद्वारोमे क्रमशः कर्मोंके जघन्य और अजघन्य प्रदेशोका विचार किया गया है। जिसमे सर्वजघन्य प्रदेशाग्र पाये जाते हैं, उसे जघन्य प्रदेशविभक्ति कहते है और जिसमे सर्वजघन्य प्रदेशा उपरितन प्रदेशाय पाये जाते है, उसे अजघन्य प्रदेशविभक्ति कहते है । मोहनीयकर्म में जघन्य प्रदेश भी पाये जाते हैं और अजघन्य प्रदेशाय भी पाये जाते है । * ( ८-११) सादि - अनादि- ध्रुव - अध्रुवप्रदेश विभक्ति- इन उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य प्रदेशाग्रोका क्रमशः सादि, अध्रुव रूपसे विचार किया गया है । प्रकृतमे मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट, I अनुयोगद्वारोमे कर्मो के अनादि, ध्रुव और अनुत्कृष्ट और जघन्य १ ( २ - ३) सव्व- गोसवपदेसविहत्तिपरूवणा-यो सो सव्ववधो णोसव्ववधो नाम, तस्स इमो दुध सो- ओघेण आदेसेण य । ओवेण णाणावरणीयस्स पदेसवधो किं सव्ववधो, णोसव्ववधो १ सव्ववधो वा, णोसव्ववधो वा । सव्वाणि पदेसवधताणि वधमाणस्स सव्वब वो । तदूण बधमाणस्स गोसव्वबधो । एव सत्तण्ह कम्माण ( महावं ० ) । सव्वविहत्ति-गोसव्व विहत्तीण दुविहो गिद्देसो-ओत्रेण आदेसेण य | ओघेण मोहणीयस्स सव्यपदेसा सव्वविहत्ती । तदूणो णोसव्वविहत्ती । जयध० २ (४-५) उक्कस्स - अणुक्कस्लपदेस विहत्तिपरूवणा - यो सो उकत्सवधो अणुक्कस्सबधो णाम, तरस इमो दुविहो णिसो-ओत्रेण आदेसेण य । ओवेण णाणावरणीयत्स किं उक्कस्मवधो अणुवस्सबधो १ उपस्सबधो वा, अणुक्कत्सवधो वा । सव्वुफस्स पदेसं बंधमाणस्स उक्तस्सवधो, तदूण वधमाणस्स अणुकस्सबधो । एवं सत्तण्ह कम्माण ( महाब ० ) । उक्करस- अणु कस्सविहत्तियाणुगमेण दुविहो गिद्देसो-ओवेण आदेसेण य । ओघेण मोहणीयत्स सन्युकस्सदन्य उकत्सविहत्ती । तदूणमणुकस्सविहत्ती । जयध ३ (६-७) जण अजहण्णपदेसविहत्तिपरुवणा-यो सो जहष्णवधो अजष्णवधो णाम, तन्म इमो दुविहो गिद्देसो-ओत्रेण आदेमेण य । ओवेण णाणावरणीयस्स कि जहण्णव धो, अजष्णवधो १ जहावधवा, अजष्णवो वा । सव्वजण पदेसग्ग वधमाणत्म जहष्णवधो । तदुवरि वधमाणस्स अजाबचो | एव सत्तरह कम्माण ( महाब ० ) । जहणाजहणविद्दत्तियानुगमेण दुविहो गिद्देसो- ओषेण आदेसेण य | ओण मोहणीयम्स सव्वजण पदेसग्ग जहणविहत्ती । तदुवरि अजष्णविह्नी । जयव० ४ (८-९) सादि-अनादि-धुव-अधुवपदे सवित्तिपरूवणा-यो मो सादिय्वघोसणादिव धुवत्रघो अद्ध्रुवबधो णाम, तत्म इमो दुविहो हि सो-ओपेण आदेसण य । ओण x x x मोहाङगाप उपस्स- अणुक्रम-जण अणपदेवभो कि मादि ४ | सादि अद्भुववधो ( महाव ९) । मादादि
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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