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________________ १७८ कसाय पाहुड सुत्त [५ प्रदेशविभक्ति और अन्तर, १५ नानाजीवोकी अपेक्षा भंगविचय, १६ परिमाणानुगम, १७ क्षेत्रानुगम, १८ स्पर्शनानुगम, १९ कालानुगम, २० अन्तरानुगम, २१ भावानुगम, और २२ अल्पवहुत्वानुगम । इन वाईस अनुयोगद्वारोके अतिरिक्त भुजाकार, पदनिक्षेप, वृद्धि और स्थान इन चार अर्थाधिकारोके द्वारा भी मूलप्रदेशविभक्तिका वर्णन किया है। किन्तु न आज उचारणाचार्य है और न सर्वसाधारणकी महावन्ध तक पहुंच ही है । अतएव यहॉपर उन अनुयोगद्वारोसे मूलप्रकृतिप्रदेशविभक्तिका संक्षेपसे कुछ वर्णन किया जाता है (१) भागाभागानुगम-एक समयमे बँधनेवाले कर्म-प्रदेशोका किस क्रमसे सर्व कर्मोमें विभाग होता है, इस वातका वर्णन इस अनुयोगद्वारमे किया गया है। जैसेकोई जीव यदि किसी विवक्षित समयमे शेप सात कर्मोंके वन्धके साथ आयुकर्मका भी वन्धकर रहा है, तो उसके उस समय वंधनेवाले कर्म-पिंडके प्रदेशोका विभाग इस प्रकार होगाआयुकर्मको सबसे कम प्रदेशोका भाग मिलेगा । नाम और गोत्रकर्मको उससे विशेष अधिक, पर परस्परमे सदृश भाग मिलेगा। नाम-गोत्रसे ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीनो कर्मोंको विशेष अधिक, किन्तु परस्परमे समान भाग मिलेगा। इनसे मोहनीयकर्मको विशेष अधिक भाग मिलेगा और मोहनीयकर्मके भागसे भी विशेप अधिक भाग वेदनीयकर्मको मिलेगा। खेत १७, पोसण १८, कालो १९, अतर २०, भावो २१, अप्पाबहुअ चेदि २२ । पुणो मुजगार-पदणिक्नेव-वडि-हाणाणि त्ति (जयध०)। जो सो पटेसब वो सो दुविहो-मूलपगदिपदेसबधो चेव, उत्तरपगदिपटेसवधो चेव । एत्तो मूलपगदिपदेसबधो पुव्व गमणीयो । भागाभागसमुदाहारोxxx एदेण अट्ठपदेण तत्य इमाणि चदुवीसं अणियोगद्दाराणि णादव्वाणि भवति । तं जहा-ठाणपरूवणा सव्वब धो णोसव्वबधो उक्कस्सबधो अणुकस्सबंधो जहण्णवंधो अजहण्णवघो एव याव अप्पाबहुगेत्ति । भुजगारबधो पदणिक्खेवो वडिवधो अज्झवसाणसमुदाहारो जीवसमुदाहारो त्ति | महाब ० १ (१) भागासोनपरूवणा-मूलपगदिपदेसबधे पुव्व गमणीयो भागाभागसमुदाहारो-अविधबधगस्स आउगभागो थोवो । णामा-गोटेसु भागो विसेसाधियो । मोहणीयभागो विसेसाधियो । वेदणीयभागो विसेसाधियो । एव सत्तविधवधगस्स वि । (णवरि तत्थ आउगभागो णत्थि )| एव छविधवधगत्स वि । (णवरि तत्थ मोहणीयभागो णत्थि) महावं० । भागाभाग दुविह-जीवभागाभाग पदेसभागाभाग चेदि । तत्थ जीवभागाभाग दुविह-जहण्णमुक्कस चउक्कस्से पयट । दुविहो णिद्देसो-ओषण आदेसण य। ओवेण मोहणीयस्स उकस्सपदेसविहत्तिया जीवा सव्वजीवाण केवडिओ भागो ? अण तिमभागो । अणुक्कस्सपदेसविहत्तिया जीवा सध्यजीवाण केवडिया भागा? अणता भागा Ixxx जहण्णए पयद । दुविहो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण य । ओवेण मोहणीयस्स जहण्णाजण्ण° उकत्साणुकस्सभगो । पदेसभागाभागाणुगमेण दुविहो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण य | ओघेण मोहणीयत्स भागाभागो णस्थि, मूलपयडीए अप्यणाए पदेसभेदाभावादो। अधवा मोहणीयसव्यपदेसा सेससतकम्मपदेतेहितो किं सरिसा विसरिसा त्ति सदेहेण विनडिवसिस्सस्स बुद्धिवाउलविणासणमिमा परूवणा एत्य अमबहा वि कीरदे । xxx सव्वत्थोवो आउगभावो। णामा-गोदभागा टो वि सरिसा विसेसाहिया । णाण दसणावरणअंतराइयाणं भागा तिष्णि वि सरिसा विसेसाहिया । मोहणीवभागो विसेसाहिओ । वेदणीयभागो विसेमाहियो । जहा वधमनिसदूण अट्टण्ट कम्माणं पदेसभागाभागपरूवणा कदा, तहा मतमस्मिदृण वि कायवा, विमेसाभावाटो।xxx जहण्णनतमन्सिदृण उपस्समतकम्मपदेमनट्टणमगो । जव०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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