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________________ १५९ गा० २२] उत्तरप्रकृतिअनुभागविभक्ति-संज्ञा-निरूपण १६. सम्मामिच्छत्तस्स अणुभागसंतकम्मं सव्वघादी दुहाणियं । १७. एकं चेव हाणं । १८.चदुसंजलणाणमणुभागसंतकम्मं सव्यघादी वा देसघादीवा, एगहाणियं वा दुहाणियं वा तिहाणियं वा चउट्टाणियं वा। १९. इत्थिवेदस्स अणुभागसंतकम्मं सव्वधादी दुट्ठाणियं वा तिहाणियं वा चउट्ठाणियं वा । २०. मोत्तूण खवगचरिमसमयइत्थिवेदयं । २१. तस्स देसघादी एगट्ठाणियं । २२. पुरिसवेदस्स अणुभागसंतकम्मं जहण्णयं देसघादी एगट्ठाणियं । २३. उक्कस्साणुभागसंतकम्मं सव्यघादी चदुढाणियं । २४. णवंसयवेदयस्स अणुभागसंतकम्मं जहाणयं सयघादी दुट्ठाणियं । २५. उकस्सयमणुभागसंतकम्मं सव्वघादी च उट्ठाणियं । २६. णवरि खवगस्स चरिमसमयणसयवेदयस्स अणुभागसंतकम्म देसघादी एगट्ठाणियं। सम्यग्मिथ्यात्वका अनुभागसत्कर्म सर्वधाती और द्विस्थानीय है। सम्यग्मिथ्यात्वके अनुभागका एक ही दारुस्थानीय स्थान है। चारो संज्वलन कपायोका अनुभागसत्कर्म सर्वघाती भी है और देशघाती भी है। तथा एकस्थानीय भी है, द्विस्थानीय भी है, त्रिस्थानीय भी है और चतुःस्थानीय भी है । अर्थात् संज्वलनकपायका अनुभाग लता, दारु, अस्थि और शैल, इन चारो स्थानोके समान होता है, क्योकि, संज्वलनकपाय देशघाती और सर्वघाती दोनो रूप है । स्त्रीवेदका अनुभागसत्कर्म सर्वघाती है। तथा वह द्विस्थानीय भी है, निस्थानीय भी है और चतु:स्थानीय भी है । अर्थात् स्त्रीवेदके फल देनेकी शक्ति दारुके अनन्तवे भागसे लेकर शैलसमान तक होती है । केवल चरमसमयवर्ती स्त्रीवेदक क्षपकको छोड़ करके । क्योकि उसके स्त्रीवेदका अनुभागसत्कर्म देशघाती और एकस्थानीय होता है ॥१२-२१॥ विशेपार्थ-उदयमे आए हुए निपेकको छोड़कर शेप समस्त वीवेद-सम्बन्धी प्रदेशसत्कर्मको पर-प्रकृतिरूपसे संक्रमणकर अवस्थित क्षपकको चरमसमयवर्ती स्त्रीवेदक क्षपक कहते है। उसे छोडकर नीचे सर्व गुणस्थानोमें स्त्रीवेदका अनुभागसत्कर्म सर्वघाती तथा द्विस्थानीय या त्रिस्थानीय या चतुःस्थानीय ही होता है। किन्तु चरमसमयवर्ती स्त्रीवेदक क्ष्पकके वह देशघाती और एकस्थानीय होता है और यही स्त्रीवदके अनुभागसकत्कर्मका सर्व-जधन्य स्थान है, ऐसा अभिप्राय जानना चाहिए। चूर्णिसू०-पुरुपवेदका जघन्य अनुभागसत्कर्म देशघाती और एकस्थानीय है । क्योकि पुरुपवेदके उदयसे क्षपकश्रेणीपर चढ़े हुए और चरमसमयवर्ती सवेदी जीवके द्वारा वाँधे हुए अनुभागसत्कर्मको पुरुपवेदका जघन्य अनुभाग माना गया है, अतएव वह देशघाती और एकस्थानीय ही होता है । पुरुपवेदका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म सर्वघाती और चतुःस्थानीय है । नपुंसकवेदका जघन्य अनुभागसत्कर्म सर्वघाती और द्विस्थानीय है । उसीका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म सर्वघाती और चतु:स्थानीय है। केवल इतनी विशेपता है कि नपुंसकवेदके उदयसे श्रेणीपर चढे हुए चरमसमयवर्ती नपुंसकवेदी क्षपकके नपुंसकवंदका अनुभागसत्कर्म देशघाती और एकम्थानीय होता है ॥२२-२६॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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