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________________ गा० २२ ] मूलप्रकृतिअनुभागविभक्ति-अनुयोगद्वार निरूपण १५५ काल पाये जाते है । जघन्य अनुभागविभक्तिवाले जीवोका जघन्यकाल एक समय है और उत्कृष्टकाल संख्यात समय है । अजघन्य अनुभागविभक्तिवाले जीव सर्व काल पाये जाते है । ' ( २१ ) अन्तरानुगम- इस अनुयोगद्वार में नाना जीवोकी अपेक्षा कर्मोंके उत्कृष्टअनुत्कृष्ट और जघन्य- अजवन्य अनुभागविभक्तिवाले जीवोके अन्तरकालका अनुमार्गण किया गया है । जैसे -मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट अनुभागविभक्तिवाले जीवोका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकके जितने प्रदेश है, उसने समयप्रमाण है । अनुत्कृष्ट अनुभागविभक्तिवाले जीवोका कभी अन्तर नहीं होता । जघन्य अनुभागविभक्तिवाले जीवोका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल छह मास है । अजघन्य अनुभागविभक्तिवाले जीवोका कभी अन्तर नहीं होता । (२२) भावानुगम - इस अनुयोगद्वार मे अनुभागविभक्तिवाले जीवोके भावोका विचार किया है | मोहनीयकर्म के सभी अनुभागविभक्तिवाले जीवोके औदयिकभाव होता है । *( २३ ) अल्पबहुत्वानुगम- इस अनुयोगद्वारमे कर्मोंके उत्कृष्ट-अनुत्कृष्टादि अनुभागविभक्तिवाले जीवोकी अल्पता और अधिकताका विचार किया गया है । जैसे - मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट अनुभागविभक्तिवाले जीव सबसे कम है और इनसे अनुत्कृष्ट अनुभागविभक्तिवाले जीव अनन्तगुणित है । मोहनीयकर्मकी जघन्य अनुभागविभक्तिवाले जीव सबसे कम है और उनसे अजघन्यअनुभागविभक्तिवाले जीव अनन्तगुणित है 1 इनके अतिरिक्त निम्नलिखित चार अनुयोगद्वारोसे भी अनुभागविभक्तिका विचार किया गया है ( १ ) भुजाकारविभक्ति - इस अनुयोगद्वार से भुजाकार, अल्पतर और अवस्थित अनुभागविभक्तिवाले जीवोका समुत्कीर्तना, स्वामित्व आदि स्थितिविभक्तिम बतलाये गये तेरह अनुयोगद्वारोसे विचार किया गया है । ( २ ) पदनिक्षेप - इस अनुयोगद्वारमे समुत्कीर्तना, स्वामित्व और अल्पबहुत्त्रके द्वारा भुजाकार अनुभागविभक्तिवाले जीवोका जघन्य उत्कृष्ट वृद्धि, हानि और अवस्थानके द्वारा विशेष विचार किया गया है । समया । अजणाणुभागविहत्तिया केवचिर कालादो होति १ सन्यद्धा । जयध० १ ( २१ ) अंतर परूवणा-अतराणुगमो दुविहो-जहणओ उक्कत्सओ चेदि । उक्कस्सए पयद । दुविहो गिद्द सो- ओघेण आदेसेण य । ओघेण मोहणीयस्स उक्क्स्साणुभागतर केवचिर कालादो होदि १ जहणणेण एगसमओ | उक्करसेण असखेजा लोगा । अणुक्ा स्याणुभागतर णत्थि । XXX जहाए पयद । दुविद्दि सो- ओघेण आदेसेण य । तत्थ ओघेण मोहणीयस्स जहणाणुभागस्स अंतर क्वचिर कालो होदि ' जहणेण एगसमओ । उक्क्स्सेण छम्मासा | अजहष्णाणुभागतर णत्थि । जयध २ (२२) भावपरूवणा - भावानुगमेण सव्वत्थ ओइयो भावो । ३ ( २३ ) अप्पाचहुअप रुवणा- अप्पाचहुअ दुविर - जहष्णमुफरस च । उत्कन्मए पवद । दुविहो जिद्द सो- ओघेण आदेसेण य । ओवेण सव्वत्थोवा मोहणीयस्स उत्राणुभागवित्तिया । अणुरसाणुभागविहत्तिया अणतगुणा । XXX जहणए पयः । दुविहो हि सो-सोवेण आदेने व । थोत्रेण सन्वत्थोवा गोहणीयस्स जहणाणुभागविहनिया जीवा । अजहरणाणुभागविरत्तिया अवगुणा ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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