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________________ गा० २२] मूलप्रकृतिअनुभागविभक्ति-अनुयोगहार-निरूपण १५३ विचार किया गया है। जैसे-मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट अनुभागविभक्तिके कदाचित् सर्व जीव अविभक्तिक है १ । कदाचित् अनेक जीव अविभक्तिक होते है और कोई एक जीव विभक्तिक होता है २ । कदाचित् अनेक जीव अविभक्तिक और अनेक जीव विभक्तिक होते है ३ । इस प्रकार उत्कृष्ट अनुभागविभक्ति-सम्वन्धी तीन भंग पाये जाते हैं। इसी प्रकार अनुत्कृष्ट अनुभागविभक्तिके भी तीन भंग होते है। केवल इतना भेद है कि उनके भंग कहते समय विभक्ति पद पहले कहना चाहिए। इसी प्रकारसे मोहनीयकर्मके जघन्य और अजघन्य अनुभागविभक्ति-सम्बन्धी भी तीन-तीन भंग होते है । '(१६) भागाभागानुगम-इस अनुयोगद्वारमे कर्मोंकी उत्कृष्ट-अनुत्कृष्ट और जघन्यअजघन्य अनुभागविभक्तिवाले जीवोके भाग और अभागका विचार किया गया है । जैसेमोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट अनुभागविभक्तिवाले जीव सर्व जीवोके कितनेवे भाग है ? अनन्तवे भाग है । अनुत्कृष्ट अनुभागविभक्तिवाले जीव सर्व जीवोके कितनेवे भाग है ? अनन्त वहुभाग है । जघन्य अनुभागविभक्तिवाले जीव सर्व जीवोके अनन्तवे भाग हैं और अजधन्यानुभागविभक्तिवाले सर्व जीवोके अनन्त बहुभाग है । (१७) परिमाणानुगम-इस अनुयोगद्वारमे विवक्षित कर्मके उत्कृष्ट अनुभागविभक्तिवाले जीव एक साथ कितने पाये जाते है, अनुत्कृष्ट अनुभागविभक्तिवाले कितने पाये जाते हैं, इस प्रकारसे उनके परिमाणका विचार किया गया है। जैसे-मोहकर्मके उत्कृष्ट अनुभागविभक्तिवाले जीव द्रव्यप्रमाणसे कितने है १ असंख्यात है। अनुत्कृष्ट अनुभागविभक्तिवाले य अबधगो य, सिया अवधगा य अबंधगा य । अणुकस्सअणुभागस्स सिया सवे वधगा य, सिया बधगा य अवधगो य, सिया बधगा य अवधगा यI XXX जहण्णए पगद । दुविहो णि सो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण तत्थ इम अठ्ठपद उक्कस्सभगो । घादिचउकाण गोदस्स च जण्ण-अजहष्णाणुभागस्स भगविचयो उकस्सभगो (महाब०) । णाणाजीवेहि भगविचओ दुविहो-जहण्णओ उकस्सओ चेदि । उक्कस्से पयद । दुविहो णिद्द सो-ओघेण आदेसेण य । तस्थ ओघेण मोहणी यस्स उकस्साणुभागविहत्तीए सिया सब्वे जीवा अविहत्तिया १, सिया अविहत्तिया च विहत्तिओ च २, सिया अवित्तिया च विहत्तिया च | एवमणुकस्स पि, णवरि विहत्ती पुव्व भाणिदव्वा | xxx जहण्णए पयद । दुविहो णि सो-ओषेण आदेसेण य । तत्थ ओवेण मोरणीयस्स जहणाणुभागस्स सिया सवे जीवा अविहत्तिया १, सिया अवित्तिया च वित्तिओ च २, सिया अविहत्तिया च विहत्तिया ३ । अजहण्णस्स सिया सत्र जीवा वित्तिया १, सिया विहत्तिया च अविहत्तिओ च २, सिया वित्तिया च अविहत्तिया च ३। जयध १ (१६ ) भागाभागपरूवणा-भागाभागाणुगमो दुविहो-जहण्णओ उकस्सओ चेदि । तत्थ उद्यास्सए पयद । दुविहो णिद्देसो-ओषेण आदेमेण य । ओषेण मोहणीयस्स उकत्साणुभागवित्तिया सव्वजीवाण केवडिओ भागो ? अणतिमभागो । अणुकत्साणुभागविहत्तिया सव्वजीवाण क्वडिओ भागो ? अणता भागा | XXX जहणए पयद । दुविहो णिद्देसो-ओघण आदेसेण च । ओषेण जहणाणुभागवित्तिया सव्वजीवाण केवडिओ भागो ? अण तिमभागो। अजहणाणुभागवित्तिया सन्यजीवाण केवडिओ भागो ? अणता भागा । जयध २ (१७) परिमाणपरूवणा-परिमाणाणुगमो दुविहो-जहणयो उपरसओ चदि । उपन्स, पयदं । दुविहो णिहे सो गोषण आदेमेण य । ओघेण उपरमाणुभागवित्तिया देवटिया' अनन्येना।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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