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________________ १५२ कसाय पाहुड सुत्त [४ अनुभागविभक्ति विभक्ति कितने समय तक होती है, इस वातका एक जीवकी अपेक्षासे विचार किया गया है । प्रकृतमे मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट अनुभागविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। अनुत्कृष्ट अनुभागविभक्तिका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्टकाल असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमित अनन्तकाल है। मोहनीयकर्मकी जघन्य अनुभागविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अजघन्य अनुभागविभक्तिका काल अनादि-अनन्त और अनादि-सान्त है। (१४ ) अन्तर-इस अनुयोगद्वारमे एक जीवकी अपेक्षासे कर्मोंके उत्कृष्ट और जघन्य अनुभागविभक्तिके अन्तरकालका विचार किया गया है। प्रकृतमें मोहनीयकर्म विवक्षित है, उसके उत्कृष्ट अनुभागविभक्तिका जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमित अनन्तकाल है। जघन्यानुभागविभक्तिवालोका अन्तर नहीं होता है। (१५) नानाजीवापेक्षया भंग-विचय-इस अनुयोगद्वारमें नाना जीवोकी अपेक्षा कर्मोके उत्कृष्ट-अनुत्कृष्ट और जघन्य-अजघन्य अनुभागकी विभक्ति-अविभक्ति करनेवाले जीवोका णिद्देसो-ओवेण आदेसेण य | ओघेण घादिचउक्काण उक्कस्साणुभागबधो केवचिर कालादो होदि ? जहvणेण एगसमय । उक्कस्सेण बेसमय | अणुक्कस्साणुभागव धो जहण्णेण एगसमय । उकस्सेण अणतकालमसखेन्जा पोग्गलपरियट्टा | xxx जहण्णए पगद | दुविहो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण च । ओघेण धादिच उकाण गोदस्स च जहण्णाणुभागबधो जहण्णुकस्सेण एगसमय । अजण्णाणुभागबधो तिभगो (महाव०) कालो दुविहो-जहण्णओ उकस्सओ चेदि । उकस्से पथद | दुविहो णिहो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण मोहणीयस्स उक्करमाणुभागविहत्ती केवचिर कालादो होदि १ जहण्णुदस्सेण अतोमुहुत्त । अणुक्कस्साणुभागविहत्ती जहण्णेण अनोमुहुत्त । उक्कस्सेण अणतकालमसखेजा पोग्गलपरियट्टा | XXX जहण्णए पयद । दुविहो णि सो-ओघेण आटेसेण य । तत्थ ओघेण मोहणीयस्स जहण्णाणुभागविहित्तिया केवचिर कालादो होति ? जहण्णु कस्सेण एगसमओ । अजहण्णाणुभागविहत्ती अणादि-अपनवसिदो अणादि-सपज्जवसिदो सादि सपजवसिदो वा । जयध १ (१४) अंतरपरूवणा-अतर दुविध-जहणणय उकस्सय च । उकस्सए पगद । दुविहो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण य | ओघेण धादिचउक्काण उक्कस्साणुभागमतर वचिर कालादो होदि ? जहण्णेण एगसमय । उक्कस्सेण अणतकालमसखेजा पोग्गलपरियट्टा । अणुकस्समणुभागमतर जहण्णेण एगसमग्र । उकस्सेण अतोमुहुत्त ।xxx जहण्णए पगद । दुविधो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण घादिचदुकाण जहण्णाणुभागवधस्स णस्थि अतर । अजहण्णाणुभागबधो जहणणेण एगसमय । उकस्सेण अतोमुहुत्त (महाब०) । अतराणुगमेण दुविहमतर-जहण्णमुक्कस्स च । उकस्से पयद । दुविहो जिद्द सो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण मोहणीयस्स उकस्साणुभागमतर केवचिर कालादो होदि १ जहण्णेण अतोमुहुत्त । उकस्सेण अणतकालमसरोजा पोग्गलपरियट्टा। अणुकरसाणुभागविहत्ती जहण्णुकस्सेण अतोमुहुत्त । जण्णए पयदं । दुविहो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण मोहणीयस्स जहण्णाणुभागवित्तियाण णथि अतर | जयध० २ (१५) णाणाजीवेहि भंगविचयपरूवणा-णाणाजीवेहि भगविचय दुविध-जहण्णय उकत्सय च । उकस्मए पगद तत्य इम अपद-जे उकस्साणुभागव धगा ते अणुकस्सअणुभागस्स अवधगा। ने अणुकस्माणुभागवधगा ते उकस्साणुभागस्स अवधगा। एव पगदी बधदि, तेसु पगद, अवधगेमु थव्यवहारो। एदेण अठ्ठपटेण अण्डं कम्माण उक्कस्सअणुभागस्स सिया मध्ये अवधगा, सिया अवधगा
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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