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________________ [ ४ अनुभागविभक्ति सर्व अनुभाग और नोसर्व अर्थात् सर्वसे कम अनुभागका विचार किया गया है । जिस कर्ममे अनुभाग-सम्बन्धी सर्व स्पर्धक पाये जाते है, वह सर्वानुभाग विभक्ति है और जिसमे उससे कम स्पर्धक पाये जायें, उसे नोसर्वांनुभागविभक्ति कहते हैं। मोहनीयकर्ममे सर्वानुभाग और नोसर्वानुभाग दोनो प्रकारका अनुभाग पाया जाता है । 9 १ (४-५ ) उत्कृष्ट अनुभागविभक्ति-अनुत्कृष्ट अनुभाग विभक्ति- इन अनुयोगद्वारोमे कर्मोंके उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट अनुभागका विचार किया गया है । जिस कर्ममे सर्वोत्कृष्ट अनुभाग पाया जावे, उसे उत्कृष्टअनुभागविभक्ति कहते है और जिसमे उससे कम अनुभाग पाया जावे, उसे अनुत्कृष्ट अनुभागविभक्ति कहते हैं । मोहनीय कर्ममे उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट दोनो प्रकारका अनुभाग पाया जाता है । १५० कसाय पाहुड सुत्त * ( ६-७ ) जघन्यानुभागविभक्ति - अजघन्यानुभागविभक्ति - इन अनुयोगद्वारोंमे कर्मों के जघन्य और अजघन्य अनुभागका विचार किया गया है । जिस कर्ममे सबसे जघन्य अनुभाग पाया जावे, वह जन्घयानुभागविभक्ति है और जिसमें जघन्यसे उपरिवर्ती अनुभाग पाया जावे, उसे अजघन्यानुभागविभक्ति कहते हैं । मोहनीयकर्ममे जघन्य और अजघन्य दोनों प्रकारका अनुभाग पाया जाता है । * ( ७ - १९) सादि - अनादि-व-अभ्रव अनुभागविभक्ति- इन अनुयोगद्वारोमे कर्मोंके उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य अनुभागोका सादि, अनादि, ध्रुव और अध्रुव रूपसे ओघेण आदेसेण य । तत्थ ओघेण णाणावरणीयरस अणुभागवधो किं सव्वबधो णोसव्ववधो १ सव्ववधो वा गोसव्ववधो वा । सव्वे अणुभागे बधदि त्ति सव्ववधो । तदो ऊणिय अणुभाग वधदित्ति गोसव्वधो । एव सत्तहं कम्माण ( महाब ० ) । सव्वविहत्ति - गोसव्वविहत्तियाणुगमेण दुविहो णिसो- ओघेण आदेसेण य । ओघेण मोहणीयस्स सव्त्रफद्दयाणि सव्वविहत्ती । तदूण णोसव्वविहत्ती । जयध० १ ( ४-५ ) उक्कस्स - अणुक्कस्सबंधपरूवणा-यो सो उकस्सबधो णाम, तस्स इमो णिद्देसोघेण आदेसेण य । तत्थ ओघेण णाणावरणीयस्स अणुभागयधो किं उक्कस्सबधो अणुक्कस्सबधो १ उकस्सबधो वा अणुक्कसवो वा । सव्युक्वस्सिय अणुभाग बधदित्ति उक्कस्सबधो । तदो ऊणियं वधदि त्ति अणुक्कस्तवधो । एव सन्तण्ह कम्माण ( महाव० ) । उकस्साकस्साणुगमेण दुविहो णिद्देसो- ओघेण आदेसेण य । ओघेण मोहणीयस्स सयुक्कस्सओ अणुभागो उक्कस्सविहत्ती । तदूणमणुक्कस्स विद्दत्ती । जयध० २ ( ६-७ ) जहण्ण- अजहण्णवंधपरूवणा-यो सो जहण्णबंधो अजहण्णवधो णाम, तस्स इमो णिद्देसो- ओघेण आढेसेण य । तत्थ ओघेण णाणावरणीयरस अणुभागवधो किं जहण्णबधो अजहण्णवधो १ जहण्णवधो वा अजहण्णवधो वा । सव्वजहण्णय अणुभाग वधमाणस्स जहणव धो। तदो उवरि बंधमाणस्स अजष्णवधो । एव सत्तरह कम्माणं ( महाव० ) । जहण्णाजहण्णविहत्तियाणुगमेण दुविहो गिद्देसोओघेण आदेसेण य | ओघेण मोहणीयस्स सव्वजहणओ अणुभागो जहणविहत्ती । तदुवरिमा अजहणविद्दत्ती | ( जयध० ) ३ ( ८-११ ) सादि-अणाटि धुव अद्भुवबंध परूवणा-यो सो सादिवधो अणादिवधो धुववध अद्ध्रुवत्र धो णाम, तस्स इमो निद्देसो- ओघेण आदेसेण य । तत्थ भोवेण चदुण्ह घादीण उकस्सव घो अणुकस्सबधो जहण्णव'धो किं सादिवधो अणादिवधो धुवबधो अवबधो वा ! सादिय-अद्भुववधो । अजहण्णवधो किं सादि० ४ १ सादियवधो वा अणादियवधो वा धुववधो वा अद्भुववधो वा ( महाव० ) । सादि-अनादि 1
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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