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________________ १३४ कसाय पाहुड सुत्त [३ स्थितिविभक्ति ३०३. अप्पाबहुअं । मिच्छत्तस्स सव्वत्थोवा भुजगारद्विदिविहत्तिया । ३०४. अवद्विदहिदिविहत्तिया असंखेजगुणा । ३०५. अप्पदरहिदिविहत्तिया संखेजगुणा । ३०६. एवं वारसकसाय-णवणोकसायाणं । ३०७. सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं सव्वत्थोवा अवद्विदहिदिविहत्तिया । ३०८. भुजगारहिदिविहत्तिया असंखेजगुणा । ३०९. अवत्तव्यद्विदिविहत्तिया असंखेजगुणा । ३१०. अप्पदरहिदिविहत्तिया असंखेजगुणा । ३११. अणंताणुबंधीणं सव्वत्थोवा अवत्तव्वहिदि विहत्तिया । ३१२. भुजगारद्विदिविहत्तिया अणंतगुणा । ३१३. अवडिदहिदिविहत्तिया असंखेजगुणा । ३१४. अप्पदरहिदिविहत्तिया संखेजगुणा । मान, माया और लोभ कषायोका भी विभक्तिसम्बन्धी सन्निकर्प जानना चाहिए । इसी प्रकार अप्रत्याख्यानावरण आदि वारह कपाय और नव नोकपायोकी विभक्तिसम्बन्धी सन्निकर्प जानना चाहिए । किन्तु इन काँकी अल्पतरविभक्तिवाला जीव मिथ्यात्व और अनन्तानुवन्धीचतुष्ककी अविभक्तिवाला भी होता है । इनके अर्थात् बारह कपाय और नव नोकपायोकी अल्पतरविभक्तिवाले जीवके अनन्तानुवन्धी-चतुष्ककी अवक्तव्यविभक्तिका सन्निकर्प मिथ्यात्वके समान जानना चाहिए । यह उपयुक्त सन्निकर्प उपशम और क्षपकश्रेणीकी विवक्षा नहीं करके कहा गया है, क्योकि उनकी विवक्षा करनेपर कुछ और भी विशेषता है, सो उसे आगमके अनुसार जानना चाहिए। चूर्णिसू०-अव उक्त भुजाकार आदि विभक्तिवाले जीवोंकी संख्या-निर्णयके लिए अल्पबहुत्व अनुयोगद्वार कहते है। मिथ्यात्वप्रकृतिकी भुजाकारस्थितिविभक्तिवाले जीव आगे कहे जानेवाले सर्वपदोकी अपेक्षा सबसे कम है। मिथ्यात्वकी भुजाकार स्थितिविभक्तिवालोसे मिथ्यात्वकी अवस्थितस्थितिविभक्तिवाले जीव असंख्यातगुणित हैं। मिथ्यात्वकी अवस्थितस्थितिविभक्तिवालोंसे मिथ्यात्वकी अल्पतरस्थितिविभक्तिवाले जीव संख्यातगुणित है। इसी प्रकार अप्रत्याख्यानावरण आदि बारह कपाय और नव नोकपायोके भुजाकार आदि विभक्तिवाले जीवोका अल्पवहुत्व जानना चाहिए ॥३०३-३०६॥ ___ सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दो प्रकृतियोकी अवस्थितस्थितिविभक्तिवाले जीव आगे कहे जानेवाले सर्वपदोकी अपेक्षा सबसे कम है। इनसे इन्ही दोनो प्रकृतियोके भुजाकारस्थितिविभक्तिवाले जीव असंख्यातगुणित है। इनसे इन्हीं दोनो प्रकृतियोकी अवक्तव्यस्थितिविभक्तिवाले जीव असंख्यातगुणित हैं। इनसे इन्हीं दोनो प्रकृतियोकी अल्पतरस्थितिविभक्तिवाले जीव असंरयातगुणित हैं ॥३०७-३१०॥ अनन्तानुवन्धी चारों कपायोकी अवक्तव्यस्थितिविभक्तिवाले जीव आगे कहे जानेवाले सर्वपदोकी अपेक्षा सबसे कम है। अनन्तानुबन्धीकी अवक्तव्यस्थितिविभक्तिवालांसे भुजाकारस्थितिविभक्तिवाले जीव अनन्तगुणित हैं। अनन्तानुवन्धीकी भुजाकार स्थितिविभक्तिवालासे अवस्थितस्थिनिविभक्तिवाले जीव असंख्यातगुणित हैं। अनन्तानुवन्धीकी अवस्थित स्थितिविभक्तिवालोने अल्पतरस्थितिविभक्तिवाले जीव संख्यातगुणित है ॥३११-३१४।।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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