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________________ गा० २२] स्थितिविभक्ति-पदनिक्षेप-निरूपण १३५ ३१५. एत्तो पदणिक्खेवो । ३१६. पदणिक्खेवे परूवणा सामित्तमप्पाबहुअं च । ३१७. अप्पावहुए पयदं। ३१८. मिच्छत्तस्स सव्वत्थोवा उक्कस्सिया हाणी । ३१९. उक्कस्सिया वड्डी अवट्ठाणं च सरिसा विसेसाहिया । ३२०. एवं सबकम्माणं सम्मत्त-सम्मामिच्छत्तवजाणं । ३२१. णवरि णqसयवेद-अरदि-सोग-भय-दुगुंछाणमुक्क. स्सिया वड्डी अवठ्ठाण थोवा । ३२२. उक्कस्सिया हाणी विसेसाहिया । ३२३. सम्मत्तसम्मामिच्छत्ताणं सव्वत्थोवमुक्कस्समवहाणं । ३२४. उक्कस्सिया हाणी असंखेज्जगुणा । ३२५. उक्कस्सिया बड्डी विसेसाहिया । ३२६. जहणिया वड्डी जहणिया हाणी जहण्णमवठ्ठाणं च सरिसाणि । चूर्णिसू०-अव इससे आगे पदनिक्षेप कहते है ॥३१५॥ विशेषार्थ-भुजाकारके विशेष निरूपण करनेको पदनिक्षेप कहते है, क्योकि, यहॉपर भुजाकार आदि पदोकी वृद्धि, हानि और अवस्थानसंज्ञा करके जघन्य और उत्कृष्ट विशेषणो द्वारा उनका विशेष निर्णय किया गया है । चूर्णिसू०-पदनिक्षेप अधिकारमे प्ररूपणा, स्वामित्व और अल्पबहुत्व, ये तीन अनुयोगद्वार है ।।३१६॥ विशेपार्थ-किन-किन प्रकृतियोमे वृद्धि हानि, और अवस्थान होते है और किनकिनमे नहीं, इस बातका निरूपण प्ररूपणा-अनुयोगद्वारमे किया गया है। मिथ्यात्व आदि प्रकृतियोकी वृद्धि, हानि आदि किस जीवके होते है, इस प्रकारसे उनके स्वामियोका वर्णन स्वामित्व अनुयोगद्वारमें किया गया है । इन दोनो अनुयोगद्वारोके सुगम होनेसे यतिवृपभाचार्यने उनका व्याख्यान नहीं किया है। चूर्णिसू०-अल्पवहुत्व अनुयोगद्वार प्रकृत है । अर्थात् अब पदनिक्षेपसम्बन्धी अल्पवहुत्वको कहते हैं । मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट हानि आगे कहे जानेवाले पदोंकी अपेक्षा सबसे कम होती है । इससे मिथ्यात्वकी वृद्धि और अवस्थान ये दोनो परम्पर सदृश हो करके भी विशेष अधिक होते है। इसी प्रकार सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दोनो प्रकृतियोको छोड़ करके शेप सर्वकर्मोकी वृद्धि हानि और अवस्थान जानना चाहिए । किन्तु नपुंसकवेद, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा, इन प्रकृतियोकी उत्कृष्ट वृद्धि और अवस्थान सबसे कम होते हैं । इससे इन्ही प्रकृतियोकी उत्कृष्ट हानि विशेप अधिक होती है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दोनो प्रकृतियोका उत्कृष्ट अवस्थान सबसे कम है। इससे इन्हीं दोनो प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट हानि असंख्यातगुणित होती है । इससे इन्ही दोनो प्रकृतियोकी उत्कृष्ट वृद्धि विशेप अधिक होती है ॥३१७.३२५॥ चूर्णिसू०-मोहकर्मकी सभी प्रकृतियोकी जघन्य वृद्धि, जघन्य हानि और जयन्य अवस्थान सहश होते हैं, क्योकि, इन सबके कालका प्रमाण एक समय है। इसलिए उनमे अल्पबहुत्व नहीं है ॥३२६॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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