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________________ १२७ गा० २२ ] स्थितिविभक्ति-काल-निरूपण raft भुजगारकम्मंसिओ उक्कस्सेण एगूणवीससमया । सोलह कपाय और नवनोकपायोकी भुजाकार विभक्तिका उत्कृष्टकाल उन्नीस समय-प्रमाण है ।। २५७-२५८ ॥ विशेषार्थ - उक्त उन्नीस समयोका स्पष्टीकरण इस प्रकार है- किसी एक ऐसे एकेन्द्रिय या विकलेन्द्रिय जीवने जिसकी आयु सत्तरह समय से अधिक एक आवली - प्रमाण शेप रही है, अनन्तानुवन्धी क्रोधको छोडकर शेप अनन्तानुबन्धी मान, मायादि पन्द्रह प्रकृतियोका क्रमशः अद्धाक्षय हो जानेसे पन्द्रह समयोके द्वारा उनकी स्थितिको उत्तरोत्तर बढ़ाकर बन्ध करते हुए संक्रमणके योग्य किया । पुनः बन्धावलीकालके व्यतीत होनेपर और सत्तरह समयप्रमाण आयुके शेष रहनेपर पूर्वोक्त आवलीकालमे प्रथम समय से लेकर पन्द्रह समयोमे वृद्धि करके बांधी हुई उक्त पन्द्रह कपायों की स्थितिको वन्ध-परिपाटी के अनुसार अनन्तानुवन्धी क्रोधमे संक्रमण करनेपर अनन्तानुबन्धी क्रोध - सम्बन्धी भुजाकारविभक्ति के पन्द्रह समय प्राप्त होते है । पुनः सोलहवे समयमे अद्धाक्षयसे अनन्तानुबन्धी क्रोध के साथ स्थिति को बढ़ाकर वॉधनेपर भुजाकारविभक्तिका सोलहवाँ समय प्राप्त होता है । पुन: सत्तरहवे समयमै संक्लेशक्षय होनेसे अनन्तानुबन्धी क्रोधके साथ सर्व कपायोकी स्थितिको बढ़ाकर बॉधनेपर भुजाकारविभक्तिका सत्तरहवाँ समय प्राप्त होता है । पुनः उसके एक विग्रह करके संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवोम उत्पन्न होनेके प्रथम समयमे असंज्ञी जीवोके योग्य सहस्र सागरोपमके सात भागोमे से यथायोग्य चार भागप्रमाण वॉधनेपर भुजाकारविभक्तिका अट्ठारहवाँ समय प्राप्त हुआ । पुनः शरीरको ग्रहण करके संज्ञी पंचेन्द्रियोके योग्य अन्तः कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थितिका बन्ध करनेपर भुजाकार - विभक्तिका उन्नीसवॉ समय प्राप्त होता है । इस प्रकार भुजाकारस्थितिविभक्तिके सूत्रोक्त उन्नीस समय सिद्ध हो जाते है । ऊपर जिस प्रकार से अनन्तानुवन्धी क्रोधकी भुजाकारविभक्तिके उन्नीस समयोकी प्ररूपणा की है, उसी प्रकार मान, मायादि शेप पन्द्रह प्रकृतियोमे से हर एक की इसी परिपाटी से भुजाकारस्थितिविभक्तिके उन्नीस समयोकी प्ररूपणा जानना चाहिए। इसी प्रकार नवो नोकपायोकी भी भुजाकारविभक्ति - सम्बन्धी उन्नीस समयोकी प्ररूपणा जानना चाहिए | केवल इतनी विशेषता है कि उक्त सत्तरह समय से अधिक आवली कालप्रमित आयुके शेप रह जानेपर उस एकेन्द्रिय या विकलेन्द्रिय जीवके आवलीके प्रथम समयसे लेकर क्रोधादि कपायोकी परिपाटी से अद्धाक्षय होनेके साथ सोलह समयमात्र कालको बढ़ाकर उनका बन्ध कराके, पुन: सत्तरह वे समयमे संक्लेश-क्षय होने से सभी - सोलहो प्रकृतियोका भुजाकारस्थितिबन्ध कराके पुनः एक आवलीकाल विताकर कपायोकी स्थितिको नव नोकपायोकी स्थितिमे परिपाटी संक्रमण करानेपर नव- नोकपायसम्बन्धी भुजाकारविभक्तियोका सत्तरवाँ समय प्राप्त होता है । पुनः मरणकर एक विग्रहके साथ संज्ञी पंचेद्रियोके उत्पन्न होनेके प्रथम समय मे असंज्ञी पंचेन्द्रियोके योग्य स्थितिको बढ़ाकर बन्ध करनेपर अट्ठारहवाँ समय और शरीर-पर्याप्टिको प्रारग्भ कर संज्ञी पंचेन्द्रियोके योग्य स्थितिको बढ़ाकर बन्ध करनेपर उसके भुजाकारविभक्तिका
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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