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________________ १२६ कसाय पाहुड सुत्त [३ स्थितिविभक्ति जहण्णेण एगसमओ । २५३. उक्कस्सेण तेवहिसागरोवमसदं सादिरेयं । २५४. अवविदकम्मंसिओ केवचिरं कालादो होदि ? २५५. जहण्णेण एगसमओ । २५६. उकस्सेण अंतोयुहुत्तं । २५७. एवं सोलसकसायाणं णवणोकसायाणं। २५८. समय है और उत्कृष्टकाल साधिक एकसौ तिरेसठ सागरोपम है ॥२५२-२५३॥ विशेपार्थ-भुजाकार अथवा अवस्थितविभक्तिको करनेवाले जीवके विद्यमान सत्त्वसे एक समय नीचे उतरकर स्थितिवन्ध करके पुनः द्वितीय समयमे भुजाकार या अवस्थित विभक्तिको करनेपर अल्पतरविभक्तिका एक समयप्रमाण जघन्यकाल पाया जाता है । मिथ्यात्वकर्मकी अल्पतरविभक्तिका उत्कृष्टकाल कुछ अधिक एक सौ तिरेसठ सागरोपमप्रमाण है। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-कोई एक तिर्यच अथवा मनुष्य मिथ्यावृष्टि जीव एक स्थितिको वांधता हुआ विद्यमान था। उस स्थितिके नीचे अल्प स्थितिको वांधते हुए उसने अल्पतरविभक्तिका तत्प्रायोग्य सर्वोत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्तकाल व्यतीत किया । पुनः तदनन्तरवर्ती समयमे उस स्थितिसत्त्वका उल्लंघन करके स्थितिवन्ध करनेवाला था कि आयुके क्षय हो जानेसे मरण करके तीन पल्योपमकी स्थितिवाले उत्तम भोगभूमियॉ जीवोसे उत्पन्न हुआ। पुनः वहाँ जीवनके अन्तर्मुहूर्त अवशिष्ट रहनेपर सम्यक्त्वको ग्रहण किया और उसके साथ ही यथायोग्य प्रथम या द्वितीय स्वर्गमे उत्पन्न हुआ। वहाँसे च्युत हो मनुष्य हुआ, फिर मरकर यथायोग्य आनत-प्राणत आदि कल्पामे उत्पन्न हुआ। इस प्रकार उसने सम्यक्त्वके साथ पूरे च्यासठ सागरोपम व्यतीत किये और अन्तमे सम्यग्मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ । पुनः अन्तमुहूर्तके पश्चात् ही सम्यक्त्वको ग्रहण किया और उसके साथ फिर पूरे छयासठ सागरोपमकाल तक भ्रमण कर अन्तमें तत्प्रायोग्य परिणामोके द्वारा मिथ्यात्वको जाकर इकतीस सागरोपमकी आयुस्थितिवाले ग्रैवेयकदेवोंमें उत्पन्न हुआ। पुनः वहाँसे च्युत हो मनुष्योमें उत्पन्न हुआ । वहाँ जहॉतक सम्भव है, वहॉतक अन्तर्मुहूर्तकाल स्थितिसत्त्वसे नीचे स्थितिवन्ध कर पुनः संक्लेशको पूरित कर भुजाकारविभक्ति करनेवाला हो गया। इस प्रकार दो अन्तर्मुहूर्त और तीन पल्योंसे अधिक एक सौ तिरेसठ सागर अल्पतरविभक्तिका उत्कृष्ट काल जानना चाहिए। चूर्णिसू०-मिथ्यात्वकर्मकी अवस्थितविभक्तिका कितना काल है ? जघन्यकाल एक समय है। क्योकि, भुजाकार अथवा अल्पतरविभक्तिको क्रनेवाले जीवके एक समय स्थितिसत्त्वके समान स्थितिके बाँधनेपर अवस्थितविभक्तिका एक समय पाया जाता है । मिथ्यात्वकर्मकी अवस्थित विभक्तिका उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। क्योकि, भुजाकार अथवा अल्पतर विभक्तिको करके सत्त्वके समान स्थितिबन्ध करनेका उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहुर्तप्रमाण पाया जाता है ॥२५४-२५६॥ __चूर्णिमू०-जिग्न प्रकार मिथ्यात्वकर्मकी भुजाकार, अल्पतर और अवस्थित विभक्तियोके कालकी प्ररूपणकी है, उसी प्रकार सोलह कपायों और नव नोकपायोकी भुजाकार अन्पतर और अवस्थितविभक्तिसम्बन्धी प्रमपणा करना चाहिए । विशेपता केवल यह है कि
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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