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________________ गा० २२ ] स्थितिविभक्ति-सन्निकर्प-निरूपण असंखेजदिभागेणूणा त्ति । १६७. सम्मत्त-सम्मामिच्छताणं द्विदिविहत्ती किमुक्कस्सा, अणुकस्सा ? १६८. णियमा अणुकस्सा । १६९. उकस्सादो अणुकस्सा अंतोमुहुत्तृणमादि कादूण जाव एगा हिदि त्ति । १७०. णवरि चरिमुव्वेलणकंडयचरिमफालीए ऊणा त्ति । १७१. सोलसकसायाणं हिदिविहत्ती किमुक्कस्सा, अणुकस्सा ? १७२. णियमा अणुक्कस्सा । १७३. उकस्सादो अणुकस्सा समऊणमादि कादूण जाव आवलिऊणा त्ति । १७४. पुरिसवेदस्स हिदिविहत्ती किमुक्कस्सा अणुकस्सा १ १७५. णियमा अणुक्कस्सा । १७६. उकस्सादो अणुक्कस्सा अंतोमुत्तूणमादि कादूण जाव अंतोकोडाकोडि ति । १७७. हस्स-रदीणं द्विदिविहत्ती किमुक्कस्सा अणुकस्सा ? १७८. उकस्सा वा अणुकस्सा कांडकसे नीचे उक्त जीवके मिथ्यात्वकी अनुत्कृष्ट स्थिति संभव नहीं है ॥१६४-१६६॥ चूर्णिसू०-स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति करनेवाले जीवके सम्यक्त्व और सम्यग्मिध्यात्व, इन दो प्रकृतियोकी स्थितिविभक्ति क्या उत्कृष्ट होती है, अथवा अनुत्कृष्ट होती है ? नियमसे अनुत्कृष्ट होती है ॥१६७-१६८।। विशेपार्थ-इसका कारण यह है कि मिथ्याष्टि जीवमे सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिका अभाव होता है और मिथ्यादृष्टि जीवको छोड़कर सम्यग्दृष्टि जीवमे स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति होती नहीं है, क्योकि, वहांपर उसके बंधका अभाव है। चूर्णिसू०-वह अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्ति उत्कृष्ट स्थितिमेसे एक अन्तर्मुहूर्त कमसे लगाकर एक स्थिति तकके प्रसाणवाली होती है। वह केवल चरम उद्वेलनाकांडककी चरम फालीसे कम होती है, ऐसा विशेष जानना चाहिए । स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति करनेवाले जीवके अनन्तानुवन्धी आदि सोलह कपायोकी स्थितिविभक्ति क्या उत्कृष्ट होती है, अथवा अनुत्कृष्ट होती है ? नियमसे अनुत्कृष्ट होती है। क्योकि, कपायोके उत्कृष्ट स्थितिवन्धकालमे स्त्रीवेदके बन्धका अभाव है । वह अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्ति उत्कृष्ट स्थितिमेसे एक समय कमसे लगाकर एक आवली कम तकके प्रमाणवाली होती है । क्योकि, इसके ऊपर स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट स्थितिका होना असम्भव है ॥१६९-१७३॥ चूर्णिसू०-स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति करनेवाले जीवके पुरुषवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति क्या उत्कृष्ट होती है, अथवा अनुत्कृष्ट होती है ? नियमसे अनुत्कृष्ट होती है । इसका कारण यह है कि स्त्रीवेदके वन्धकालमे शेप वेदोके बन्धका अभाव है। वह अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्ति उत्कृष्ट स्थितिमेसे एक अन्तर्मुहूर्त कमसे लगाकर अन्तःकोडाकोड़ी सागरोपम तकके प्रमाणवाली होती है ॥१७४-१७६॥ चूर्णिसू०-स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति करनेवाले जीवके हास्य और रति. इन दो प्रकृतियोकी स्थितिविभक्ति क्या उत्कृष्ट होती है, अभवा अनुत्कृष्ट होती है ? उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृप्ट भी होती है ॥१७७-१७८।। विशेपार्थ-इसका कारण यह है कि यदि बीवेदके बन्धकालमे हान्य और रति
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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