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________________ ११६ कसाय पाहुड सुत्त [ ३ स्थितिविभक्ति वा । १७९. उक्कस्सादो अणुक्कस्सा समऊणमादि काढूण जाव अंतोकोडा कोडि त्ति । १८०. अरदि-सोगाणं द्विदिविहत्ती किमुकस्सा, अणुक्कस्सा १ १८१. उकस्सा वा अणुक्कस्सा वा । १८२. उकस्सादो अणुक्कस्सा समऊणमादि काढूण जाव वीसं सागरोवमकोडाकोडीओ पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागेणूणाओ ति । १८३. एवं पुंसयवेदस्स । १८४. णवरि णियमा अणुक्कस्सा । १८५. भय-दुर्गुछाणं द्विदिविहत्ती किमुकस्सा, अणुक्कस्सा १ १८६. णियमा उक्कस्सा । १८७, जहा इत्थवेदेण, तहा सेसेहि कम्मे हि । १८८. णवर विसेसो जाणिदव्वो । प्रकृतिका वन्ध होता है, तो इन दोनो प्रकृतियोकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति होती है और यदि बन्ध नहीं होता है, तो अनुकृष्ट स्थितिविभक्ति होती है । चूर्णिसू (० - अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्ति उत्कृष्ट स्थितिमे से एक समय कमसे लगाकर अन्तःकोड़ाकोड़ी सागरोपम तकके प्रमाणवाली होती है । स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति करनेवाले जीवके अरति और शोक, इन दो प्रकृतियोकी स्थितिविभक्ति क्या उत्कृष्ट होती है, अथवा अनुत्कृष्ट होती है ? उत्कृष्ट भी होती है, और अनुत्कृष्ट भी होती है ।। १७९-१८१ ।। विशेषार्थ - इसका कारण यह है कि यदि स्त्रीवेदके बन्धकालमे अरति और शोक प्रकृतिका बन्ध हो, तो उनकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति होगी, अन्यथा अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्ति होगी । चूर्णिसू० - अरति और शोक, इनकी अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्ति उत्कृष्ट स्थितिमेसे एक समय कमसे लगाकर पल्योपमके असंख्यातवे भागसे कम वीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम aaa प्रमाणवाली होती है ।। १८२ ॥ चूर्णिसू० - जिस प्रकार स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्तिसे निरुद्ध अरति और शोक, इन दो प्रकृतियोकी स्थितिविभक्तिकी प्ररूपणा की है, उसी प्रकार नपुंसकवेदकी भी प्ररूपणा जानना चाहिए | केवल विशेषता यह है कि नपुंसकवेदकी स्थितिविभक्ति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है । इसका कारण यह है कि स्त्रीवेद के साथ नपुंसकवेदका बन्ध नहीं होता है ॥१८३-१८४॥ चूर्णिम् ० - स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति करनेवाले जीवके भय और जुगुप्सा, इन दो प्रकृतिथोकी स्थितिविभक्ति क्या उत्कृष्ट होती है, अथवा अनुत्कृष्ट होती है ? नियमसे उत्कृष्ट होती है । इसका कारण यह है कि जिस कालमे स्त्रीवेदका बन्ध होता है, उस कालमे भय और जुगुप्सा प्रकृतिका बन्ध नियमसे होता है ।। १८५-१८६ ॥ चूर्णि० - जिस प्रकार स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट स्थितिको निरुद्ध करके उसके साथ प कर्मों की स्थितिविभक्तिसम्बन्धी सन्निकर्ष की प्ररूपणा की है, उसी प्रकार हास्य, रति और पुरुपवेद, इन तीनकी शेप कर्मप्रकृतियोंके साथ भी सन्निकर्षकी प्ररूपणा जानना चाहिए । किन्तु तत विशेष ज्ञातव्य है ॥ १८७ - १८८ ॥ विशेपार्थ- उक्त समर्पणसूत्र से जिस अर्थ और तहत विशेषताकी सूचना की गई है, } 1 7
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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