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________________ स्थितिविभक्ति-अनुयोगद्वार - निरूपण 'अन्तरप्ररूपणा - इस अनुयोगद्वार मे नाना जीवो की अपेक्षा कर्मवन्धके अन्तरकालका निरूपण किया गया है। जैसे - मोहकर्मकी उत्कृष्टस्थिति-विभक्तिवाले जीवो के अन्तरका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अंगुलके असंख्यातवें भागमात्र असंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी कालके समय प्रमाण है । मोहनीयकी जघन्यस्थिति-विभक्तिके अन्तरका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल छह मास है । मोहकर्मकी अजघन्यस्थितिविभक्तिका अन्तर नही होता है । ८९ गा० २२ ] सन्निकर्ष प्ररूपणा - मोहकर्मकी विवक्षित प्रकृति के उत्कृष्टवन्धका करनेवाला जीव अन्यप्रकृतियोका क्या उत्कृष्टबन्ध करता है, अथवा क्या अनुत्कृष्टवन्ध करता है, इस प्रकार से एक प्रकृतिकी उत्कृष्टस्थितिके बन्धकके साथ दूसरी प्रकृतिकी उत्कृष्ट अनुत्कृष्ट आदि स्थिति के बन्धकका विचार किया गया है । जैसे- मिध्यात्वकी उत्कृष्टस्थितिका वन्ध करनेवाला जीव सोलह कषाय, नपुंसकवेद, अरति, शोक, भय और जुगुप्साका नियमसे बन्ध करनेवाला होता है । किन्तु वह उनका उत्कृष्टवन्ध भी करता है, और अनुत्कृष्टवन्ध भी करता है । यदि उत्कृष्ट - बन्ध करता है, तो उसे उत्कृष्टस्थितिबन्धमेंसे एक समय कमसे लेकर पल्यके असंख्यातवे भाग कम तक बाँधता है । इस प्रकारसे मोहकर्मकी शेष प्रकृतियोके साथ भी मिध्यात्वके उत्कृष्टअनुत्कृष्ट स्थितिबन्धका विचार किया गया है । मोहकर्मकी प्रकृतियो के समान ही शेप कर्मोंकी तत्थ ओघेण मोहणीयस्स उक्करसठि विहत्तिया केवचिर कालादो' जहणणेण एगसमओ । उक्कस्सेण पलिदोवस्त असखेजदिभागो । अणुक्क० के० १ सव्वद्धा । XXX जहण्णए पयद । दुविहो णिद्दसो - ओघेण आदेसेण य | ओघेण मोहणीयस्स जहण्णठिदिविहत्तिया केवचिर कालादो ? जहणेण एगसमओ । उक्कस्टेण सखेजा समया । अज० सव्वद्धा । जयध० १ अंतरपरूवणा - अतर दुविध-जहप्णय उक्कस्य च । उक्कस्साए पयट । दुविधो णिद्द सोओघेण आदेसेण य । तत्थ ओघेण अटूट्ठण्ह कम्माण उक्कस्सट्रिट्ठदिवधतर जद्दण्णेण एगसभओ । उक्कस्से अगुलरस अससे० असखेज्जाओ ओसप्पिणि उस्सप्पिणीओ । अणुक्कस्सट्ठिदिवधतर णत्थि । Xxx जहणए पगद | दुविधो निद्देसो-ओघेण आदेसेण य । तत्थ ओघेण सत्तण्ह कम्माण जद्दण्णट्ठदिवधतरं जणेण एगसमओ । उक्कस्सेण छम्मास । अज० णत्थि अतर (महाव ० ) अतराणुगमो दुविहो-जहण्णओ उक्करसओ चेदि । उक्कस्सए पयद । दुविहो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण य । तत्थ ओघेण मोहणीयस्स उक्कस्सट्ठिदिविहत्तियाणमतर केवचिर कालादो होदि ? जहणेण एगसमओ । उक्कस्सेण अगुल्स्स असखेज्जदिभागो । अणुक्क० णत्थि अतर । XX X जहणए पयद । दुविदो णिद्द सो- ओघेण आदेसेण य । तत्थ ओघेण मोहणीयस्स जहणट्ठिविहत्तियाणमतर जहणेण एगसमओ । उक्कस्सेण छम्मासा | अज० णत्यि अतर । जयध० २ बंधसण्णियास परूवणा-चघसण्णियास दुविध-जहणय उक्कस्य च । उक्कस्सए पगद । दुविधो गिद्द सो- ओघेग आदेसेण य । तत्य ओघेण णाणावरणीयस्स उकस्सट्ठिदिं बघतो छह कम्माण णियमा बधगो । त तु उक्कस्सा वा, अणुक्कस्सा वा । उकस्सादो अणुक्कस्सा समयूणमादि काढूण पलिदोवमत्स अससेजदिभागृण वधदि । आयुगस्स सिया वधगो, सिया अवधगो । जइ बधगो, णियमा उक्त्सा । आवाधा पुण भयणिना । एव छण्ट कम्माण | आयुगस्स उक्करसट्ठिदि बधतो सत्तण्ड कम्माण नियमा बधगा । त तु उक्का वा अणुक्कस्सा वा । उक्कस्सादो अशुक्कस्सा तिट्ठाणपदिद वधदि - अमखेनदिभागहीण वा १२
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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