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________________ ८८ कलाय पाहुड सुत्त [३ स्थितिविभक्ति 'स्पर्शनप्ररूपणा-इस अनुयोगद्वारमै कर्मोंकी उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अज- . घन्य स्थितिवन्ध करनेवाले जीवोके त्रिकाल-गोचर स्पृष्ट क्षेत्रका प्ररूपण किया गया है। जैसेमोहकर्मकी उत्कृष्टस्थितिकी विभक्तिवाले जीवोने कितना क्षेत्र स्पृष्ट किया है ? वर्तमानकालकी अपेक्षा लोकका असंख्यातवाँ भाग और अतीत-अनागत कालकी अपेक्षा देशोन आठ वटे चौदह, अथवा तेरह वटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्र स्पृष्ट किया है । अनुत्कृष्टस्थिति-विभक्तिवाले जीवोने सर्वलोक स्पृष्ट किया है । जघन्यस्थिति-विभक्तिवाले जीवोने लोकका असंख्यातवॉ भाग और अजघन्यस्थिति-विभक्तिवाले जीवोने सर्वलोक स्पृष्ट किया है । इस प्रकारसे शेष सात मूल कर्मों और उनकी उत्तरप्रकृतियोकी उत्कृष्ट-अनुत्कृष्ट, तथा जघन्य-अजधन्य स्थितिकी विभक्तिवाले जीवोके त्रिकाल-विपयक स्पृष्ट क्षेत्रका वर्णन किया गया है । कालप्ररूपणा-इस अनुयोगद्वारमे नाना जीवो की अपेक्षा कर्मोकी उत्कृष्ट-अनुत्कृष्ट और जघन्य-अजघन्य स्थितिका वन्ध कितने काल तक होता है, इस वातका विचार किया गया है । जैसे-मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट स्थितिबंधका जघन्यकाल एक समय है । और उत्कृष्टकाल पल्योपमका असंख्यातवॉ भाग है । अनुत्कृष्ट स्थितिवन्धका सर्वकाल है । मोहकर्मके जवन्य स्थितिवन्धका जघन्यकाल एक समय है और उत्कृष्टकाल संख्यात समय है। अजधन्यस्थितिके बंधनेका सर्वकाल है । इस प्रकारसे सर्व मूलकों और उत्तरप्रकृतियोके उत्कृष्टअनुत्कृष्ट तथा जघन्य-अजघन्य स्थितिके जघन्य-उत्कृष्ट वन्धकालका निरूपण किया गया है । उक्कस्सटिदिविहत्तिया केवडि खेत्ते ? लोगस्स असखेजदिभागे । अणुकत्सटिदिविहत्तिया केवडि खेत्ते ? सव्वलोए |xx x जहण्णए पयद । दुविहो णि सो ओघेण आदेसेण य । तत्य जोवण जण अजाण° उक्कस्समगो | जयध १ फोसणपरूवणा-फोसण दुविध-जहण्णय उकस्सय च । उकस्सए पगद । दुविधो णिद्द सोओघेण आदेसेण य । तत्थ ओवेण सत्तण्ह कम्माण उक्कस्सठिदिवधगेहि केवडिग्र खेत्त फोसिद ? लोगरस असखेजदिमागो, अट्ठ-तेरह चोदसभागा वा देसूणा | अणुक्कसठिदिवधहि केवडिय खेत्त कोसिद ? सव्वलोगो। xx x जहणगे पगद । दुविधो णिद्द सो-ओवेण आदेसेण य । तत्थ ओवेण अट्टाह कम्माण जहण्ण-अजह्मणटिदिवंधगाण खेत्तभगो । ( महाव.)। पोसणाणुगमो दुविहो-जद्दण्णओ उक्कस्सओ च । उक्कत्से पयद । दुविहो णि(सो-ओघेण आदेशेण य । तत्थ ओघेण मोहणीयस्स उक्कस्सटिदिवित्तिएहि केवडिय खेत्त पोसिद ? लोगस्स असखेजदिभागो, अठ्ठ तेरह चोदसभागा वा देसूणा । अणुक्कसहिदिविहत्तियाण खेत्तभगो।xxx जहण्णए पयद । दुविहो जिद्द सो-ओघेण आदेसेण य । तत्थ ओघेण मोहणीयस्स जहण्णहिदिविहत्तिएहि केवडिय स्खेत्त पोसिट ? लोगस्स असखेजदिभागो। अजहण्णटिदिविहत्तियाण सवलोगो । जयध० २ कालपरूवणा-काल दुविध-जहष्णयं उक्कस्सय च । उक्स्स ए पगद । दुविधो णिहे सो. ओवेण आदेसेण य । तत्थ ओघेण सत्तण्ह कम्माणं उत्सटिदिवघगा केवचिर कालादो होति १ जहणेण एगसमओ। उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो । अणुक्कत्सटिदिवधगा देवचिर कालादो होति । सव्वदाxxx जहण्णगे पगद | दुविधो णिहेसो-ओघेण आदेसेण य । तत्थ ओघेण सत्तण्ट् कम्माण जण किदिवधगा केवचिर कालदो हॉति ? जहण्णुक्कस्सेण अंतोमुहुत्त । अज० सम्बद्धा । ( महाय०)। काला णुगमो दुविदो जहाओ उक्कन्सओ चेटि । तत्य उक्त ए पयद । दविहो णिसो-ओघेण आटेगेण य।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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