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________________ ७४ कसाय पाहुड सुत्त . [२ प्रकृतिविभक्ति संख्यात आवली है । तथा आगे भी जिन पदोमे कालका प्रमाण विशेप अधिक कहा जायगा, वहाँ वहाँ सर्वत्र संख्यात आवलीप्रमाण ही विशेप अधिक काल जानना चाहिए। लोभसंज्वलनकी दूसरी बादरकृष्टिके वेदनकालसे लोभसंज्वलनकी पहली बादरकृष्टिका वेदनकाल विशेप अधिक है। लोभसंज्वलनकी प्रथम वादरकृष्टिके वेदनकालसे मायासंज्वलनकी तृतीय संग्रहकृष्टिका वेदनकाल विशेप अधिक है। मायासंज्वलनकी तृतीय संग्रहकृष्टिके वेदनकालसे उसी मायासंज्वलनकी ही द्वितीय संग्रहकृष्टिका वेदनकाल विशेष अधिक है । मायासंज्वलनकी द्वितीय संग्रहकृष्टिके वेदनकालसे उसीकी प्रथम संग्रहकृष्टिका वेदनकाल विशेष अधिक है। मायासंज्वलनकी प्रथम संग्रहकृष्टिके वेदनकालसे मानसंज्वलनकी तृतीय संग्रहकृष्टिका वेदनकाल विशेप अधिक है । मानसंज्वलनकी तृतीय संग्रहकृष्टिके वेदनकालसे उसीकी द्वितीय संग्रहकृष्टिका वेदनकाल विशेप अधिक है। मानसंज्वलनकी द्वितीय संग्रहकृष्टिके वेदनकालसे उसीकी प्रथम संग्रहकृष्टिका वेदनकाल विशेष अधिक है। मानसंज्वलनकी प्रथम संग्रहकृष्टिके वेदनकालसे क्रोधसंज्वलनकी तृतीय संग्रहकृष्टिका वेदनकाल विशेप अधिक है । क्रोधसंज्वलनकी तृतीय संग्रहकृष्टिके वेदनकालसे उसीकी द्वितीय संग्रहकृष्टिका वेदनकाल विशेप अधिक है । क्रोधसंज्वलनकी द्वितीय संग्रहकृष्टिके वेदनकालसे उसीकी प्रथम संग्रहकृष्टिका वेदनकाल विशेष अधिक है। क्रोधसंज्वलनकी प्रथम संग्रहकृष्टिके वेदनकालसे चारो संज्वलनकपायोके कृष्टिकरणका काल संख्यातगुणा है। चारों संज्वलनकपायोके कृष्टिकरणकालसे अश्वकर्णकरणका काल विशेष अधिक है। अश्वकर्णकरणके कालसे हास्यादि छह नोकपायोके क्षपणका काल विशेप अधिक है। हास्यादि छह नाकपायोके क्षपणकालसे स्त्रीवेदके क्षपणका काल विशेष अधिक है। स्त्रीवेदके क्षपणकालसे नपुंसकवेदके क्षपणका काल विशेप अधिक है। नपुंसकवेदके क्षपणकालसे तेरह प्रकृतियोकी विभक्तिका काल संख्यातगुणा है। तेरह प्रकृतियोकी विभक्तिके कालसे वाईस प्रकृतियोकी विभक्तिका काल संख्यातगुणा है । वाईस प्रकृतियोकी विभक्तिक कालसे तेईस प्रकृतियोकी विभक्तिका काल विशेप अधिक है। तेईस प्रकृतियोकी विभक्तिके कालसे सत्ताईस प्रकृतियोकी विभक्तिका काल असंख्यातगुणा है। यहाँ गुणकार पल्योपमका असंख्यातवाँ भाग हैं । सत्ताईस प्रकृतियांकी विभक्तिके कालसे इक्कीस प्रकृतियोकी लोभत्स पढमसगहकिट्टीवेदयकालो विसेसाहिओ । मायाए तदियसगहकिट्टीवेदयकालो विसेसाहिओ । तिरसे चेव विदियसग किट्टीवेदयकालो विसेसाहिओ। पढमसगहकिट्टीवेदयकालो विसेसाहिओ । माणवदियसगह किट्टीवेदयकालो विसेसाहियो । विदियसंगहकिट्टीवेदयकालो विसेसाहिओ। पढमसगहकिट्टीवेदयकालो विसेलाहियो । कोहतदियसंगहकिट्टीवेदयकालो विसेसाहिओ। विदियसगहकिट्टीवेदयकालो विसेसाहिओ। पटमसगहकिट्टीवेदयकालो विसेसाहिओ। चदुण्ह संजलणाण किट्टीकरणद्धा सखेजगुणा । अस्सकण्णकरणक्षा विसेसाहिया । छण्णोकसायखवणद्धा विसेसाहिया । इस्थिवेदखवणद्धा विसेसाहिया। णसयवेदखवणता विसेसाहिया । तेरसवित्तियकालो संखेनगुणो। वावीसवित्तियकालो सखेनगुणो । तेवीसविहत्तियकाला विसेसाहिओ । सत्तावीसवित्तियकालो असखेजगुणो। एकवीसवित्तिय कालो असखेनगुणो । चउवीसविदत्तियकालो सखेजगुणो । अट्टागमविहनियकालो विनेमाहिओ । छब्बीसविहनियालो अण तगुणो । जयघ
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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