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________________ गा० २२] प्रकृतिस्थानविभक्ति-भंगविचय-निरूपण १०१. णाणाजीवेहि भंगविचओ। जेसि मोहणीय-पयडीओ अत्थि, तेसु पयदं । १०२. सव्वे जीवा अट्ठावीस-सत्तावीस-छब्बीस-चउवीस-एकवीससंतकम्मविहत्तिया णियमा अस्थि । १०३. सेसविहत्तिया भजियव्वा । १०४. सेसाणिओगद्दाराणि णेदव्वाणि । १०५. अप्पाबहुअं । चूर्णिसू०-अव नाना जीवोकी अपेक्षा जिन जीवोके मोहनीयकर्मकी प्रकृतियाँ पाई जाती है, उन जीवोमे सम्भव भंगोका विचय अर्थात् विचार यहॉपर किया जाता है। जो जीव अट्ठाईस प्रकृतियोकी विभक्तिवाले है, सत्ताईस प्रकृतियोकी विभक्तिवाले है, छब्बीस प्रकृतियोकी विभक्तिवाले हैं, चौबीस प्रकृतियोकी विभक्तिवाले हैं और इक्कीस प्रकृतियोकी विभक्तिवाले है, वे सब नियमसे है । अर्थात् इन स्थानोकी विभक्ति और अविभक्तिवाले जीव नियमसे होते हैं । किन्तु उक्त स्थानोसे अवशिष्ट प्रकृतियोकी विभक्तिवाले जीव भजितव्य है । अर्थात् तेईस, बाईस, तेरह, बारह, ग्यारह, पाँच, चार, तीन, दो और एक प्रकृतिकी विभक्तिवाले जीव कभी होते भी है और कभी नहीं भी होते है ॥१०१-१०३॥ चूर्णिसू०-इसी प्रकार शेष अनुयोगद्वारोको जानना चाहिए ॥१०४॥ विशेषार्थ-उपर्युक्त अनुयोगद्वारोके अतिरिक्त जो परिमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम, नानाजीवोकी अपेक्षा कालानुगम और अन्तरानुगम अनुयोगद्वार है, उनकी प्ररूपणा भी कहे गये अनुयोगद्वारोके अनुसार करना चाहिए। चूर्णिसूत्रकारने सुगम होनेके कारण उनकी प्ररूपणा नहीं की है, किन्तु इस सूत्र-द्वारा उनकी सूचनामात्र कर दी है। अतएव विशेष जिज्ञासु जन इन अनुयोगद्वारोके व्याख्यानको जयधवला टीकामे देखे । ग्रन्थ-विस्तारके भयसे यहाँ उनका वर्णन करना सम्भव नहीं है। चूर्णिसू०-अब प्रकृतिविभक्तिके स्थानोका अल्पबहुत्व कहते है ॥१०५॥ विशेषार्थ-अल्पबहुत्व दो प्रकारका है-काल-सम्बन्धी अल्पबहुत्व और जीवसम्बन्धी अल्पवहुत्व । इनमेसे पहले काल-सम्बन्धी अल्पवहुत्वको जानना आवश्यक है, क्योकि उसके विना जीव-सम्बन्धी अल्पवहुत्वका यथार्थ ज्ञान नही हो सकता है। ओष और आदेशकी अपेक्षा कालसम्बन्धी अल्पवहुत्वके दो भेद है। उनमेंसे ओघकी अपेक्षा पाँच प्रकृतियोकी विभक्तिका काल सबसे कम है। इससे लोभसंज्वलनकपायसम्बन्धी सूक्ष्म संग्रहकृष्टिके वेदनका काल संख्यातगुणा है। इसका कारण यह है कि पॉच विभक्तिके एक समय कम दो आवलीप्रमाण कालसे संख्यात आवलीप्रमाण सूक्ष्मकृष्टिके वेदनकालमै भाग देनेपर संख्यात रूप पाये जाते है । लोभसंज्वलनकी सूक्ष्म संग्रहकृष्टिके वेदनकालसे लोभसंज्वलनकी दूसरी वादरकृष्टिका वेदनकाल विशेष अधिक है । यहॉपर विशेप अधिकका प्रमाण काल-अप्पाबहुआणुगमेण दुविहो णिद्देसो ओघेण आदेसेण य । तत्थ ओघेण सव्वयोवो पचविहत्तियकालो । लोभसुहुमसगहकिडीवेदयकालो मखेजगुणो। लोभविदियवादरकिट्टीवेदवकालो विरोसाहिओ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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