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________________ कसाथ पाहुड सुत्त [२ प्रकृतिविभक्ति ख्यानावरणादि वारह कपाय और नव नोकपायोकी विभक्तिका अन्तरकाल नहीं होता है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दोनो प्रकृतियोंकी विभक्तिका जघन्य अन्तर एक समय है। तथा उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन है । अनन्तानुवन्धीकपाय-चतुष्ककी विभक्तिका जघन्य अन्तरकाल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम एकसौ वत्तीस सागर है । इसी प्रकार आदेशकी अपेक्षा नरकगतिमे नारकियोंके वाईस प्रकृतियोका अन्तरकाल नहीं है । शेप छह प्रकृतियोमेंसे सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य अन्तरकाल एक समय तथा अनन्तानुवन्धीचतुष्कका जघन्य अन्तरकाल अन्तमुहूर्त है । तथा इन्हीं छहो प्रकृातयोका उत्कृष्ट अन्तरकाल तेतीस सागर है । तिर्यग्गतिमें तिर्यंचोके सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका अन्तरकाल ओघके समान है। अनन्तानुबंधी-चतुष्कका जघन्य अन्तरकाल अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम तीन पल्य है। शेष बाईस प्रकृतियोका अन्तरकाल नहीं है। पंचेन्द्रियतिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यचपर्याप्त और पंचेन्द्रियतिर्यच योनिमती जीवोके बाईस प्रकृतियोका अन्तरकाल नही है । सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल पूर्वकोटिपृथक्त्वसे अधिक तीन पल्य है । अनन्तानुबन्धीचतुष्कका अन्तरकाल तिर्यचसामान्यके समान है । इसी प्रकार मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यनियोका अन्तरकाल जानना चाहिए । पंचेन्द्रियतिर्यंच लब्ध्यपर्याप्तोके सभी प्रकृतियोका अन्तरकाल नहीं है। इसी प्रकार लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य, नव अनुदिश, पंच अनुत्तरवासी, देव, सर्व एकेन्द्रिय, सर्व विकलेन्द्रिय, पंचेन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त, जसलब्ध्यपर्याप्त, पांचों स्थावरकाय, औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी, अपगतवेदी, अकपायी, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, विभंगज्ञानी, मतिनानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी, सर्व संयत, संयतासंयत, अवधिदर्शनी, अभव्य, सर्व सम्यग्दृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, मिथ्यादृष्टि असंज्ञी और अनाहारक जीवोका अन्तरकाल जानना चाहिए । देवोसे सम्यक्त्वप्रकृति, और सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य अन्तरकाल क्रमशः एक समय और अन्तर्मुहूर्त है । उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम इकतीस सागर है । इसी प्रकार शेप मार्गणाओमे भी प्रत्येक प्रकृतिकी विभक्तिके अन्तरकालको जानकर हृदयंगम करना चाहिए। (४) नानाजीवोंकी अपेक्षा मोहनीयकर्मकी उत्तरप्रकृतियोके विभक्ति-अविभक्तिसम्बन्धी भंगों अर्थात् विकल्पोके अनुगम करनेवाले अनुयोगद्वारको नानाजीवभंगविचयानुगम अनुयोगद्वार कहते हैं । ओबसे मोहकर्मकी सभी प्रकृतियोके विभक्ति और अविभक्ति करनेवाले जीव नियमसे होते है। इस लिए ओघकी अपेक्षा विभक्ति-अविभक्ति सम्बन्धी भंग नहीं होते हैं । किन्तु आदेशकी अपेक्षा (१) कदाचित् विवक्षित प्रकृतिकी विभक्तिवाला एक जीव होता है । (२) कदाचित् विवक्षित प्रकृतिकी अविभक्तिवाला एक जीव होता है। (३) कदाचित् विवक्षित प्रकृतिकी विभक्तिवाले अनेक जीव होते है । (४) कदाचित् विवक्षित प्रकृतिकी अविभक्तिवाले अनेक जीव होते है । (५) कदाचित विवक्षित प्रकृतिकी विभक्तिवाला एक जीव और
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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