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________________ ४, कसाय पाहुड सुत्त [२ प्रकृतिविभक्ति २३. एवं सव्वत्थ (२)। २४. जा सा दव्वविहत्तीए कम्मविहत्ती तीए पयदं। २५. तत्थ सुत्तगाहा। (४) पयडीए मोहणिजा विहत्ती तह ट्रिदीए अणुभागे। . उकस्लमणुकस्सं झीणमझीण व ठिदियं वा ॥२२॥ औदयिक और क्षायिक, इन दोनो भावोंकी युगपद् विवक्षामे अवक्तव्य है । औदयिकभाव क्षायोपशमिकभावके साथ विभक्ति है, तथा औदयिक और क्षायोपशमिक, इन दोनो भावो की युगपद् विवक्षासे अवक्तव्य है । औदयिकभाव पारिणामिकभावके साथ विभक्ति है, तथा औदयिक और पारिणामिक, इन दोनो भावोकी युगपद् विवक्षामे अवक्तव्य है। चूर्णिसू० -इसी प्रकार सर्वत्र जानना (२) ॥२३॥ विशेषार्थ-जिस प्रकारसे औदयिकभावके स्व और परके संयोगसे तीन भंग कहे हैं, उसी प्रकारसे औपशमिक, क्षायोपशमिक, क्षायिक और पारिणामिक, इन चारो भावोके भी स्व-परके संयोगसे पृथक्-पृथक् तीन तीन भंग जानना चाहिए । सूत्रके अन्तमे यतिवृषभाचार्यने (२) इस प्रकार दोका अंक लिखा है, जिसका अभिप्राय यह है कि द्रव्यविभक्ति, क्षेत्रविभक्ति, कालविभक्ति, भावविभक्ति और संस्थानविभक्तिके जो तीन तीन भंग बतलाये है, उनमेंसे प्रकृतमे दो दो भंग ही ग्रहण करना चाहिए, क्योकि, विभक्तिका निक्षेप करते समय विभक्तिसे विरुद्ध अर्थवाली अविभक्तिका ग्रहण करना नही बन सकता है । यहाँ यह शंकाकी जा सकती है कि यदि ऐसा है, तो फिर सूत्रकारको ‘अवक्तव्यभंग' भी नहीं कहना चाहिए, क्योकि, उसमे भी विभक्तिके अर्थका अभाव है ? पर इसका समाधान यह है कि विभक्तिके विना विभक्ति और अविभक्ति, इन दोनोका संयोग संभव नहीं, और उसके विना अवक्तव्य भंग संभव नहीं, अतएव विभक्तिके साथ अवक्तव्य भंगका ग्रहण किया गया है। यहाँ यह भी शंका की जा सकती है कि उक्त दोनो भंगोकी बात चूर्णिकारने अक्षरोके द्वारा क्यो नहीं कही और (२) ऐसा दोका अंक ही क्यो लिखा ? इसका समाधान यह है कि यदि वे दो का अंक न लिखकर अपने अभिप्रायको अक्षरोके द्वारा व्यक्त करते, तो फिर उनकी इस चूर्णिकी 'वृत्तिसूत्र' संज्ञा न रहती, फिर उसे टीका, पद्धतिका आदि नामोसे पुकारा जाता । अतएव यहॉपर और आगे-पीछे जहाँ कही भी ऐसी बातोके व्यक्त करनेके लिए यतिवृषभाचार्यने अंक स्थापित किये है, वह उन्होने अपनी चूर्णिकी 'वृत्तिसूत्र' संज्ञा सार्थक करनेके लिए किये है । आचार्य यतिवृपभको वीरसेनाचार्यने 'सो वित्तिसुत्तकत्ता जइवसहो मे वरं देऊ' इस मंगल-गाथामे 'वृत्तिसूत्र-कर्ता' के रूपमे ही स्मरण किया है । चूर्णिसू०-इन उपर्युक्त विभक्तियोमेसे यहॉपर द्रव्यविभक्तिके अन्तर्गत जो कर्मविभक्ति है, उससे प्रयोजन है । उसके विपयमें यह (वक्ष्यमाण) सूत्र-गाथा है ॥२४-२५॥ (४) मोहनीय कर्मकी प्रकृतिविभक्ति, स्थितिविभक्ति, अनुभागविभक्ति, उत्कृष्टअनुत्कृष्ट प्रदेशविभक्ति, क्षीणाक्षीण और स्थित्यन्तिककी प्ररूपणा करना चाहिए ॥२२॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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