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________________ ३४ कसाय पाहुड सुत्त [१ पेजदोसविहत्ती (३) पेज्जं वा दोसो वा कम्मि कसायम्मि कस्स व णयस्स । दुट्टो व कम्मि दब्वे पियायदे को कहिं वा वि ॥२१॥ ८८. एदिस्से गाहाए पुरिमद्धस्स विहासा' कायव्या । तं जहा-णेगम-संगहाणं कोहो दोसो, माणो दोसो । माया पेज्जं, लोहो पेज्ज । (३) किस-किस कपायमें किस-किस नयकी अपेक्षा प्रेय या द्वेपका व्यवहार होता है ? अथवा कौन नय किस द्रव्यमें द्वेषको प्राप्त होता है और कौन नय किस द्रव्यमें प्रियके समान आचरण करता है ? ॥२१॥ विशेपार्थ-इस आशंका-सूत्रका यह अभिप्राय है कि प्रेय और द्वेप किसे कहते है, उनका कपायोसे क्या सम्बन्ध है, वे प्रेय और द्वेप किस-किस नयके विषय होते है और यह राग-द्वेपसे भरा हुआ जीव किस द्रव्यको द्वेपकर या अपना अहितकारी समझकर उनमे द्वेपका व्यवहार करता है और किस द्रव्यको प्रियकर या हितकारी समझकर उसमे राग करता है ? इस प्रकारके प्रश्नोको उठाकर उनके समाधान करनेकी सूचना ग्रन्थकारने की है। इस प्रकार आशंका-सूत्र कहकर गुणधराचार्यने उसका उत्तर-स्वरूप सूत्र नहीं कहा, अतएव आगे व्याख्यान किये जानेवाला अर्थ निर्निवन्धन-सम्बन्ध, अभिधेय आदि रहित और दुरवहार-क्लिष्ट या दुरूह-न हो जाय, इसलिए यतिवृपभाचार्य उक्त आशंका-सूत्रसे सूचित अर्थका प्रतिपादन आगेके सूत्र-सन्दर्भ द्वारा करते है चूर्णिसू०--इस गाथाके पूर्वार्धकी विभापा-विशेष व्याख्या करना चाहिए । वह इस प्रकार है-नैगमनय और संग्रहनयकी अपेक्षा क्रोधकपाय द्वेप है, मानकपाय द्वेप है । मायाकपाय प्रय है और लोभकषाय प्रेय है ॥८८॥ विशेषार्थ-नैगम और संग्रहनयकी अपेक्षा क्रोधकपायको द्वेप कहनेका कारण यह है कि क्रोध करनेवाले पुरुषके क्रोधके निमित्तसे अगमे सन्ताप उत्पन्न होता है, शरीर कॉपने लगता है, मुखकी कान्ति फीकी पड़ जाती है। इसी प्रकार क्रोधकी अधिकतासे मनुष्य अन्धा, बहिरा और गूंगा भी हो जाता है। क्रोधी पुरुपकी स्मरणशक्तिका लोप हो जाता है । क्रोधान्ध पुरुप अपने माता, पिता, भाई, वहिन आदि स्ववन्धु-जनोको भी मार डालता है। इस प्रकार क्रोचकपाय सकल अनर्थोंका मूल है और इसीलिए उसे द्वेपरूप कहा है। क्रोधके समान ही उक्त दोनो नयोकी अपेक्षा मानकपायको भी द्वेप कहा गया है। इसका कारण यह है कि मानकषाय क्रोधकपायका अविनाभावी है, अर्थात् क्रोधक पश्चात् नियमसे उत्पन्न होता है। मानकपाय करनेवाला मानी पुरुप यद्यपि दूसरोको नीचा दिखाकर स्वयं उच्च बननेका प्रयत्न करता है, किन्तु प्रथम तो ऐसा करनेके लिए उसे १ सुत्तेण सूचिदत्थस्स विसेसिऊण भासा विभासा, विवरण ति बुत्त होइ । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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