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________________ गा० १९-२० ] सूत्रका अवतार ३३ ८७. तो सुत्तसमोदारो । पयोगका उत्कृष्ट काल दुगुना है । इससे उच्छ्वासका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इससे तद्भवस्थकेवली के केवलज्ञान, केवलदर्शन और सकषायी जीवकी शुकुलेश्याका उत्कृष्ट काल स्वस्थानमे परम्पर सदृश होकर विशेष अधिक है । इससे एकत्ववितर्क - अवीचारशुक्लध्यानका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इससे पृथक्त्ववितर्कवीचारशुक्लध्यानका उत्कृष्ट काल दुगुना है । इससे प्रतिपाती सूक्ष्मसाम्परायका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इससे आरोहक सूक्ष्मसाम्पराय उपशामकका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इससे सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इससे मानकपायका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इससे कोवकषायका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है। इससे मायाकषायका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इससे लोभकपायका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इससे क्षुद्रभवग्रहणका उत्कृष्ट काल विशेप अधिक है । इससे कृष्टीकरणका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है। संक्रामणका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इससे अपवर्तनका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इससे उपशान्तकपायका उत्कृष्ट काल दुगुना है । इससे क्षीणकपायवीतरागछद्मस्थका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इससे चारित्रमोहनीय उपशामकका उत्कृष्ट काल दुगुना है । इससे चारित्रमोहनीय क्षपकका उत्कृष्ट काल विशेष अधिक है । इस प्रकार अद्धापरिमाणका निर्देश करनेवाला अर्थाधिकार समाप्त हुआ । अब कसायपाहुडके पन्द्रह अर्थाधिकारोंमेंसे प्रथम अर्थाधिकार कहने के लिए चूर्णि - कार प्रतिज्ञासूत्र कहते है चूर्णिसू०. ० - इस उपर्युक्त अद्धापरिमाण अर्थाधिकारके अनन्तर गाथासूत्रका समवतार होता है ॥ ८७ ॥ विशेषार्थ - इससे पहले कही गई बारह सम्बन्ध - गाथाएँ अद्धापरिमाण और अधिकार-निर्देश करनेवाली गाथाएँ भी तो गुणधराचार्य के मुख- कमलसे विनिर्गत होने के कारण 'सूत्र' ही है ? फिर उनकी सूत्रसंज्ञा न करके अब आगे कही जानेवाली गाथाओकी सूत्रसंज्ञा क्यों की जा रही है ? इस शंकाका समाधान यह है कि इस अल्पबहुत्वसे आगेकी सूत्र- गाथाऍ कसायपाहुडके पन्द्रह अर्थाधिकारोने प्रतिबद्ध है । किन्तु पूर्वोक्त बारह सम्बन्ध-गाथाएँ और छह अद्धापरिमाण निर्देश करनेवाली गाथाएँ, तथा अधिकार-निर्देश करनेवाली दो गाथाएँ, किसी एक अर्थाधिकार से सम्बन्धित नहीं है, अपि तु सभी-पन्द्रहो- अर्थाधिकारो मे साधारणरूपसे सम्बद्ध है, इस बात के बतलाने के लिए 'एतो सुत्तसमोदारो' ऐसा प्रतिज्ञा सूत्र यतिवृपभाचार्यने कहा है । अतएव उक्त गाथाओंके गुणधराचार्य-प्रणीत होनेपर भी चूर्णिकारने आगे आनेवाली गाथाओकी ही सूत्रसंज्ञा की है । अब पेज्जदोसविहत्ती नामक प्रथम अर्थाधिकार मे प्रतिबद्ध गाथासूत्रको कहते है - ५.
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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