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________________ २८ कसाय पाहुड सुत्त [१ पेजदोसविहत्ती ८०. पाहुडं णिक्खिवियव्वं-णामपाहुडं ठवणपाहुडं दव्यपाहुडं भावपाहुडं चेदि, एवं चत्तारि णिक्खेवा एत्थ होति । ८१. णोआगमदो दव्यपाहुडं तिविहंसचित्त अचित्तं मिस्सयं च । ८२. णोआगमदो भावपाहुडं दुविहं-पसत्थमप्पसत्थं च । ८३. पसत्थं जहा-दोगंधियं पाहुडं । ८४. अप्पसत्थं जहा-कलहपाहुडं । चूर्णिसू०-पाहुड या प्राभृत इस पदका निक्षेप करना चाहिए। नामप्राभृत, स्थापना प्राभृत, द्रव्यप्राभृत और भावप्राभृत, इस प्रकार प्राभृत्तके विषयमे चार निक्षेप होते हैं ॥८०॥ ___नाम, स्थापना, आगमद्रव्य, नोआगमद्रव्य, ज्ञायकशरीर, और भव्यद्रव्य, इन निक्षेपोका अर्थ सुगम होनेसे उन्हे न कहकर चूर्णिकार तद्वयतिरिक्तनोआगमद्रव्यनिक्षेपका स्वरूप कहते हैं चूर्णिसू०-तद्वयतिरिक्तनोआगमद्रव्यप्राभृत सचित्त, अचित्त और मिश्रके भेदसे तीन प्रकार का है ॥८१॥ ' विशेषार्थ-प्राभृत अर्थात् भेट-स्वरूप भेजे गये हाथी, घोड़े आदि सचित्तनोआगमद्रव्यप्राभृत कहलाते है। सोना, चाँदी, माणिक, मोती, हीरा, पन्ना आदि उपहाररूप द्रव्यको अचित्तनोआगमद्रव्यप्राभृत कहते है। भेट स्वरूप भेजे जानेवाले सोने, चॉदी और जवाहरात आदिसे लदे हुए हाथी, घोड़े आदि मिश्रनोआगमद्रव्यप्राभृत है। चूंकि, भेट या उपहारमें दिये जानेवाले द्रव्य व्यवहारमे प्राभृत कहलाते है, इस अपेक्षा यहाँ प्राभृतका अर्थ किया गया है, और वे द्रव्य तीन प्रकारके होते हैं, इसलिए नोकर्स-तद्व्यतिरिक्तनोआगमद्रव्यप्राभृतके तीन भेद किये गये है, ऐसा अभिप्राय समझना चाहिए। आगमभावप्राभृतका अर्थ सुगम है, इसलिए उसे न कहकर नोआगमभावप्राभृतनिक्षेपका स्वरूप कहते है - चूर्णिसू ०-नोआगमभावप्राभृत प्रशस्त और अप्रशस्तके भेदसे दो प्रकारका होता है ॥८२॥ विशेषार्थ--आनन्दके कारणस्वरूप शास्त्रादि द्रव्यके समर्पणको प्रशस्तनोआगमभावप्राभृत कहते हैं । वैर, कलह आदिके कारणभूत द्रव्यके प्रस्थापनको अप्रशस्तनोआगमभावप्राभृत कहते है । इन दोनोकी अपेक्षा नोआगमभावप्राभृतके दो भेद हो जाते हैं । अब प्रशस्त और अप्रशस्तनोआगमभावप्राभृतका स्वरूप कहते हैं चूर्णिसू०-~-दोग्रन्थरूप पाहुडका समागम प्रशस्तनोआगमभावप्राभृत है। कलहजनक द्रव्यका समर्पण अप्रशस्तनोआगमभावप्राभृत है ॥८३-८४॥ विशेपार्थ-परमानन्द और आनन्दमात्रको 'दोग्रन्थिक' कहते है। किन्तु केवल परमानन्द और आनन्द रूप भावोका आदान-प्रदान संभव नहीं, अतः उपचारसे उनके कारणभूत द्रव्योके भेजनेको दोग्रन्थिक-प्राभृत कहा जाता है । इसके दो भेद है, परमानन्दप्राभृत और आनन्दमात्रप्राभृत । इनमे, केवलज्ञान और केवलदर्शनके द्वारा समस्त विश्वके
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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