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________________ “गा० १३-१४] द्वेषमे निक्षेप-निरूपण - ३१. दोसो णिक्विवियव्यो-णामदोसो ठवणदोसोदव्यदोसो भावदोसो चेदि । ३२. णेगम-संगह-बवहारा सव्वे णिक्खेवे इच्छंति । ३३. उजुसुदो ठवणवज्जे । ३४. सद्दणयस्स णामं भावो च। ३५. णोआगमदव्वदोसो णाम जंदव्वं जेण उवघादेण उवभोगं ण एदि तस्स दव्यस्स सो उवघादो दोसो णाम | ३६ तं जहा । ३७. साडियाए अग्गिदद्ध वा मूसयभक्खियं वा एवमादि । अब द्वेषका निक्षेप करनेके लिए उत्तरसूत्र कहते है-- चूर्णिस०--द्वेपका निक्षेप करना चाहिए- नामद्वेष, स्थापनाद्वेप, द्रव्यद्वेप और भावद्वेष ॥३१॥ विशेषार्थ--'द्रुप' इस प्रकारके नामको नामद्वेष कहते है। किसी चेतन या अचेतन पदार्थमे द्वेपभावके न्यासको स्थापनाद्वेष कहते है । अतीत या अनागतकालमे द्वेषरूप होनेवाले जीवको द्रव्यद्वेष कहते है। वर्तमानकालमे द्वेषभावसे परिणत पुरुषको भावद्वेप कहते है। __ अब उक्त चारो प्रकारके द्वेषनिक्षेपोके स्वामिस्वरूप नयोके प्रतिपादन करनेके लिए उत्तरसूत्र कहते है-- चूर्णिसू०-नैगम, संग्रह और व्यवहारनय सर्व द्वेषनिक्षेपोको स्वीकार करते है। इसका कारण यह है कि द्वेषका आधार द्रव्य ही होता है और द्रव्यको विषय करना द्रव्यार्थिकनयोका कार्य है । ऋजुसूत्रनय स्थापनानिक्षेपको छोड़कर शेष तीन निक्षेपोकोनामद्वेष, द्रव्यद्वेप और भावद्वेपको-विषय करता है क्योकि, इस नयम स्थापनाद्वेपको विपय करना संभव नहीं है। इसका कारण यह है कि ऋजुसूत्रनय द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावके भेदसे पदार्थोंको भेदरूप ग्रहण करता है, इसलिए उनमे एकत्व नही हो सकता है और इसीलिए बुद्धिके द्वारा अन्य पदार्थमे अन्य पदार्थकी स्थापना नहीं की जा सकती है । शब्दनयके नामद्वेप और भावद्वेष विषय है इसका कारण यह है कि शब्दनयोमे स्थापना और द्रव्यनिक्षेपका व्यवहार संभव नही है ॥३२-३४॥ अब, नामद्वेष , स्थापनाद्वेष, और आगमद्रव्यद्वषनिक्षेप तथा नोआगमद्रव्यद्वेषके भेदस्वरूप ज्ञायकशरीर और भव्यद्रव्यनिक्षेप सुगम है, इसलिए उनका स्वरूप नहीं कहकर तद्वयतिरिक्तनोआगमद्रव्यद्वपके स्वरूपनिरूपणके लिए उत्तरसूत्र कहते है चूर्णिसू०---जो द्रव्य जिस उपाघातके निमित्तसे उपभोगको नहीं प्राप्त होता है, वह उपचात उस द्रव्यका द्वेष कहलाता है. इसीका नाम तद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यद्वेषनिक्षेप है । जैसे-साड़ीका अग्निसे दग्ध होना, मूषकोंसे खाया जाता, इत्यादि ॥३५-३७॥ विशेषार्थ-शरीर-संस्कारके कारणभूत साडी आदि . उपभोग्य वस्तुओंको यदि अचानक अग्नि लग जाय, अथवा चूहे काट खायें, या इसी प्रकारका अन्य भी कोई उपद्रव हो जाय, तो निमित्तशास्त्रके अनुसार उनका फल दुर्भाग्यकी प्राप्ति, सन्तति और सम्पत्तिका
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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