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________________ ९०३ सू० १९] केवलिसमुद्धात-निरूपण - १५. एदेसु चदुसु समएसु अप्पसत्थकस्मंसाणमणुभागस्स अणुसमयओवट्टणा । १६. एगसमइओ हिदिखंडयस्स घादो। १७. एत्तो सेसिगाए द्विदीए संखेज्जे भागे हणइ । १८. सेसस्स च अणुभागस्स अणते भागे हणइ । १९. एत्तो पाए डिदिखंडयस्स अणुभागखंडयस्स च अंतोमुहुत्तिया उक्कीरणद्धा । हूर्त प्रमाण हो जाती है, पर वह सयोगी जिनके आयुकर्मकी स्थितिसे संख्यातगुणी अधिक होती है, ऐसा चूर्णिकारका मत है, क्योंकि उसके संख्यातगुणित अधिक हुए विना आगे जो योग-निरोध-सम्बन्धी कार्य-विशेष बतलाये गये हैं, उनका होना अशक्य है। पर कुछ आचार्य कहते है कि इस विषयमे दो उपदेश पाये जाते है-महावाचक आर्यमंक्षुक्षपणके उपदेशानुसार तो लोकपूरणसमुद्धातके होनेपर आयुकर्मके समान ही शेप सव कर्मोंकी स्थिति हो जाती है। किन्तु महावाचक नागहस्तिक्षपणके उपदेशानुसार शेष कर्मों की स्थिति अन्तमुहूर्त-प्रमित होते हुए भी आयुकर्मकी स्थितिसे संख्यातगुणित अधिक होती है । चूर्णिकारने इसी दूसरे मतका अनुसरण किया है। चूर्णिसू०-केवलिसमुद्धातके समयोमें अप्रशस्त काशोके अनुभागकी प्रतिसमय अपवर्तना होती है। एक समयवाले स्थितिकांडकका घात होता है, अर्थात् एक-एक स्थितिकांडकका घात करता है । इससे आगे अर्थात् लोकपूरणसमुद्धातके पश्चात् आत्मप्रदेश संकोचनेके प्रथम समयसे लेकर आगेके समयोमे शेष रही हुई अन्तर्मुहूर्तप्रमित स्थितिके संख्यात भागोका घात करता है । तथा शेष रहे अनुभागके अनन्त बहुभाग अनुभागका भी नाश करता है । इस स्थलपर स्थितिकांडक और अनुभागकांडकका उत्कीरणकाल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है ॥१५-१९॥ विशेषार्थ-ऊपर चार समयोमे क्रमशः दंड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण अवस्थाका वर्णन किया जा चुका है। पॉचवें समयमे सयोगिजिन आत्मप्रदेशोका संकोच करते हुए प्रतर-अवस्थाको प्राप्त होते हैं। इस समयमे समयोगपना नष्ट हो जाता है और सभी पूर्वस्पर्धक उघड़ आते हैं। छठे समयमे प्रदेशोका और भी संकोच होकर कपाट-दशा प्रगट होती है। तीसरे, चौथे और पॉचवें समयमें कार्मणकाययोग रहता है। परन्तु छठे समयमे औदारिकमिश्रकाययोग हो जाता है। सातवें समयमे कपाटरूप अवस्थाका भी संकोच होकर दंडसमुद्धातरूप अवस्था होती है। इसमें औदारिककाययोग प्रगट हो जाता है। तदनन्तर समममें दंड-अवस्थाका संकोच हो जाता है और केवली भगवान् स्वस्थानभावसे अवस्थित हो जाते हैं । कितने ही आचार्य इस अन्तिम समयको नही गिनकर समुद्धात-संकोचके तीन ही समय कहते हैं और कितने ही आचार्य उसे गिनकर चार समय ही लोकपूरणसमुद्धातके संकोचके मानते हैं। उनके अभिप्रायसे जिस समयमें अवस्थित होकर दंडका उपसंहार करते हैं वह समय भी समुद्धात-दशाके ही अन्तर्गत है। समुद्बात-संकोचके इन चार समयोमे प्रतिसमय कर्मोंकी स्थितिका घात होता है और अप्रशस्त अनुभागका भी घात होता है। किन्तु
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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