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________________ खवणाहियार-चूलिया अण मिच्छ मिस्स सम्मं अट्ठ णबुंसित्थिवेदछक्कं च । पुंवेदं च खवेदि हु कोहादीए च संजलणे ॥१॥ अध थीणगिद्धिकम्मं णिहाणिहा य पयलपयला य । अध णिस्य-तिरियणामा झीणा संछोहणादीसु॥२॥ सव्वस्स मोहणीयस्स आणुपुव्वीय संक्रमो होई । लोभकसाए णियमा असंक्रमो होइ बोद्धव्वी ॥३॥ क्षपणाधिकार-चूलिका अब क्षपणाधिकारकी चूलिकाके प्ररूपण करनेके लिए ये वक्ष्यमाण सूत्र-गाथाएँ ज्ञातव्य हैं अनन्तानुबन्धी-चतुष्क, मिथ्यात्य, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति, इन सात प्रकृतियोंको क्षपकश्रेणी चढ़नेसे पूर्व ही क्षपण करता है। पुनः क्षपकश्रेणी चढ़ते हुए अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें अन्तरकरणसे पूर्व ही आठ मध्यम कपायोंका क्षय करता है। पुनः नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, हास्यादि छह नोकपाय और पुरुपवेदका क्षय करता है । तदनन्तर संज्वलनक्रोध आदिका क्षय करता है ॥१॥ मध्यम आठ कपायोंके क्षय करनेके अनन्तर स्त्यानगृद्धि कर्म, निद्रानिद्रा और प्रचलाप्रचला इन तीन दर्शनावरणीय प्रकृतियोंको, तथा नरकगति और तिर्यग्गतिसम्बन्धी नामकर्मकी तेरह प्रकृतियोंको संक्रमण आदि करते समय क्षीण करता है।।२।। विशेषार्थ-वे तेरह प्रकृतियाँ ये हैं-१ नरकगति, २ नरकगत्यानुपूर्वी, ३ तिर्यग्गति, ४ तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, ५ द्वीन्द्रियजाति, ६ त्रीन्द्रियजाति, ७ चतुरिन्द्रियजाति, ८ उद्योत, ९ आतप, १० एकेन्द्रियजाति, ११ साधारण, १२ सूक्ष्म और १३ स्थावरनामकर्म । भूतबलि-पुष्पदन्त आचार्यके मतानुसार पहले इन उपर्युक्त सोलह प्रकृतियोका क्षय करके पीछे आठ मध्यम कपायोका क्षय करता है। किन्तु गुणधर और यतिवृषभ आचार्यके मतानुसार पहले आठ मध्यम कपायोका क्षय करके पुनः सोलह प्रकृतियोका क्षय करता है, ऐसा सिद्धान्त-भेद जानना चाहिए। मोहनीयकर्मकी सम्पूर्ण प्रकृतियोंका आनुपूर्वीसे संक्रमण होता है। किन्तु लोभकपायका संक्रमण नही होता है, ऐसा नियमसे जानना चाहिए ॥३॥ १ कसायपाहुडगाथाङ्क १२८ । २ कसाय० गा० १३६ । ११३
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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