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________________ चतुर्थभाग १६१ सरल मनका क्षमाशील ब्राह्मण था । उसने कहा महाराज एक आदमी के द्वारा कोई अपराध हो जाय तो एकवार माफ करदेना चाहिये राजाने कहा, जो अपराध दंड करने योग्य ही हो, उस पर दया करना राजाको शोभा नहिं देता । तु मनमें कुछ खेद न -कर, घरको, जा, ऐसा कह कर राजाने उसे घर भेज दिया और कमठ को चुलाकर उसका मुंह कालाकरके गधेपर चढ़ाकर उसको शहर भर में फिगया तत्पश्चात् उसे देशले निकाल दिया । कमठ बहुत दुखी हुवा वहांसे निकालकर भूताचल पर्वतपर तापसियोंके श्राश्रममें पहुंचा वहां सब तपस्वी अज्ञान तप करते थे । उनमें से एकको वडा तपस्वी समझ उसके पास गया उसने - उसे दीक्षित करके उसे भी तापसी बना लिया । कमठके चित्त मैं वैराग्य तौ बिलकुल था ही नहीं । वह भी बाहरले कायक्लेश करने लगा। उसने एक बडी भारी शिक्षा दोनों हाथमें उठा लो और खड़ा २ कायक्लेश करने लगा । इधर मरुभूति मंत्री कमठका पता लगाता रहा जब उसे मालूम हुआ कि वह भूताचल पर्वतपर तपस्या करता है तब उसने एकादि राजासे प्रार्थना कर कहा कि महारज ! मेरा भाई भूताचल पर्वत पर तपस्या करता है। सो उससे मिल भाऊं । राजाने कहा कि वह वडा दुष्ट है उससे मिलनेमें सिवाय हानिके कुछ " भी लाभ नहि होगा सो वहां हरगिज नहिं जाना। परंतु वह सरल स्वभावी था भ्रातृवात्सल्य के कारण उससे रहा नहिंगया इसलिये वह एकदिन भूताचल पर्वतपर कमउके पास पहुंच गया। और बोला कि "भध्या मेरा अपराध क्षमा कर | मैंने राजासे
SR No.010334
Book TitleJain Bal Bodhak 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBharatiya Jain Siddhant Prakashini Sanstha
PublisherBharatiya Jain Siddhant Prakashini Sanstha
Publication Year
Total Pages375
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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