SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 179
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ भैया भगवतीदास १६७ मन बतीसी इसमें मन की चंचलता का ३२ छन्दों में बड़ा सुन्दर वर्णन है । मन के वश किए विना कुछ भी नहीं होता एक छन्द में इसका मनोहर वर्णन देखिए । । कहा मुड़ाए मूह से कहा मटुका | कहा नहाए गंग नदी के तट्टका ॥ कहा वचन के सुन कथा के पट्टका । जो वस नाहीं तोहि पसेरी अटुका ॥ यदि तेरा ८ पसेरी का मन वश में नहीं है तो हे भाई ? मठ में रहने, सिर घुटाने, गंगा में नहाने और कथा पाठ के पढ़ने से' क्या होता है ? कितने सीधे और सरल शब्द है । चेतन कर्म चरित्र : चैतन्य राजा मिथ्या नींद में कुमति के साथ सोता था । अचानक सुमति देवी वहाँ आती है वह कहती है हे राजा ! तू गफलत में क्यों पड़ा हुआ है तेरे पीछे कर्म चोर लगे हुए हैं तू सावधान हो । वह उसे समझाती है कि तू इन चोरों से छुटकारा पाने के लिए अपने स्वरूप का ध्यान कर। यह हाल देखकर कुमति नाराज होकर अपने पिता मोह के पास जाकर शिकायत करती है मोह चैतन्य से युद्ध करता है और हारकर भाग जाता है। इसका सुन्दर वर्णन कवि ने २९६ छन्दों में किया है कविता सरल और सुबोध है ? सोबत महत मिथ्यात में, चहुँ गति शय्या पाय । घीती. मिथ्या नींद तह, सुरुचि रही ठहराय ॥
SR No.010269
Book TitleJain Kaviyo ka Itihas ya Prachin Hindi Jain Kavi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMulchandra Jain
PublisherJain Sahitya Sammelan Damoha
Publication Year
Total Pages207
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy