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________________ पृथ्वीचंद्र ने गुणसागरनुं चरित्र. ३७ गुरुनी पासें याव्या. त्यारें ते श्रीजयनंदन सूरियें ते बेदु नाइयोने दीक्षा पी. पढी ते बेदु मुनियें थोडा दिवसमां अग्यार अंगोनुं अध्ययन क. ने साधुनी क्रियाउने विषे तत्पर, निरंतर साम्यने धारण करनार, तीव्र तपनुं खाचरण करनार एवा ते बेडु मुनि, घणा दिवस पर्यंत चारि नुं सेवन करी अनेक राजान्यें अर्चित खने अनशन व्रतथी शुष्क थयुं ने कलेवर जेनुं, निर्मल एवा अध्यात्मस्वरूपने जोनारा, निष्पापानु वैकगोचर, स्वपरस्वनावना अवलोकनने विषे रत, निर्मम निरहंकार का समाधिमरणें करी मरण पामीने नवमा ग्रैवेयकने विषे यह is देवपणे उत्पन्न यया ॥ यतः ॥ ईर्ष्याविपादरहितावह मिंदेवौ, तौ दिव्यांग सुखलब्धिरतौ च तत्र ॥ प्रीणनूरिरितौ सविवेकमेक, त्रिश न्मितानि नंयतोननु सागराणि ॥ १ ॥ अर्थः- त्यां नवमयैवेयकने विषे ईर्ष्याने विषाद तेणें रहित, दिव्य एवा जोग ने सुख, तेनी लब्धिने विषेयासक्त, की या गयां बे, महोटां डुरित जेनां एवा ते बेहु यह मिंदेवो, विवेक सहित एकत्रीश सागरोपम आयुष्यने जोगवता हवा. इति श्री पृथ्वीचंद ने गुणसागरना चरित्रने विषे गिरिसुंदर नृपति, रत्नसारयुवराज पितृव्यपुत्र, हिबांधवाधिकारवर्णननामा अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥ चाहिं सुधीमां पृथ्वीचं अने गुणसागरना शोल नव संपूर्ण थया ॥ १६ ॥ ॥ अथ ॥ ॥ नवमसर्गस्य बलावबोधः प्रारज्यते ॥ ॥ श्लोक ॥ जीयानेिंगीगंगा, स्वच्छसंवरदा हि या ॥ साधुईसैः श्रिता त्यक्ता, पंकाकुलजडाशयैः ॥ १ ॥ काङ्गीः फलं च्युत्वा ततः पुण्याव शेषवान् ॥ गिरिसुंदरदेवोय, मुत्पन्नोयत्र तछृणु ॥ २ ॥ अर्थः- स्वच्छ संव रने देनारी, साधुरूप हंसोयें याश्रय करेली, पापरूपपंकें करी व्याप्त एवा जडाशय पुरुषोयें त्याग करेली एवी जे श्रीनेंड्नी वाणीरूप गंगा बे, ते संततकाल जयवंती वर्त्तो. अर्थात् जय पामो हवे कवि कहे बे, के हे नव्यजनो ! नवमा यैवेयकने विषे देवता थयेलो ते गिरिसुंदर कुमार, अरिहं तनी वाणीनुं फल जोगवीने, एटले जैनशास्त्रप्रमाणें तप तथा जिना राधनप्रमुख साधनथी देवलोकनुं सुख जोगवीने तेमांथी पण रहेलां शेष
SR No.010252
Book TitleJain Katha Ratna Kosh Part 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhimsinh Manek Shravak Mumbai
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1892
Total Pages517
LanguageHindi
ClassificationDictionary
File Size66 MB
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