SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 214
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 09 जैनकथा रत्नकोष नाग सातमो. यूथथकी बेहु जुदा थइ गया अने पूर्वनी पढ़ें युद्ध करवा लाग्या, तेवामां त्यां तत्रत्य निन्न लोकोयें दीता, के तुरत पाशमां नाखी, ग्रहण कस्या अने परंपराना रिवाज प्रमाणे तेने राजाने सोप्या, त्यां पण परस्पर, पूर्व प्रमाणे युद्ध करवा लाग्या. यु६ करता एवा ते बदुने जोश्ने राजायें महोटा कटें करी जुदा पाड्या. एवा समयमां त्यां केवली जगवान् समोसस्या, त्यारे तो ते नगरनो जयसेन नामा राजा वंदन करवामाटे गयो, अने गुरुना मुखथकी देशना सांजली. पडी अवसर जोश्ने राजायें आश्चर्यथकी पोताने त्यां लडता एवा ते बे हाथीना बच्चाना पूर्व जन्मनो व्यतिकर पूब्यो, त्यारें केवली नगवाने तेना पूर्वजन्मनुं सर्व वृत्तांत कही बताव्युं ते सांजली राजाने वैराग्य उत्पन्न थयो, तेथी पोताना पुत्रने राज्य गादीपर बेसारी केवली पासें जश् चारित्र ग्रहण कस्युं. पली गुरुचारित्र पालीने ते राजा स्वर्गमां गयो. अने बेदु हस्तीपोत मरण पामीने प्रथम नरकने विषे नारकी थया, त्यां परमाधामी देवताउनी करेती अत्यंत वेद नाउने अनुनवीने पाबी कुयोनिने विषे परिचमण करशे. माटें हिंसा थकी अनेक दोषो थाय ने अने दयाथकी अनेक गुणो थाय , तेथी हिंसानो सर्वदा त्यागज करतो. या प्रमाणे करेला नपदेशथी बोध पामेली ते सर्व स्त्रीयोयें प्रथम दयाव्रतरूप अणुव्रत अंगीकार कस्युं. हे पूर्णचं कुमार ! ते समय में विचार कस्यो, के आ मुनियें बद सारं कस्तूं, कारण के प्रास्त्रीयो थी मारुं वैरूप्य वगेरे कांश पण थाशे नहिं तेथी प्रथम में आ मुनिनी एकेक अंगमां पांच पांच प्रहार करवा धारेला ,ते विचार बंध राखी हवे ते मुनिने लाकडीना एकेक अंगमां चार चार प्रहार करीश? एम ज्यां दुं विचार करूं , तेवामां तो पानी फरीने मुनियें देशना देवानो प्रारंन कसो. ते जेम केःहे श्राविका! सत्यवाणी जे ,ते धर्म, अर्थ अने काम,ए त्रणे पदार्थने देवावाली ले तथा स्वर्ग मोदने पण देवावाली बे. कारण के सत्यवादी मनुष्य सर्वजनने प्रिय होय ने अने ते वली विश्वासन पात्र थाय . देव, दानव वगेरे सर्व ते प्राणीनी आज्ञाने अंगीकार करे ले. तो माणसो तेनी आशा पाले, तेमां तो गुंज आश्चर्य के ? सत्यवादी ज ननो जल, वायु, वगेरे सर्व दिव्य वस्तु जे जे, ते पण कोइ दिवस अप कार करती नथी. सहु को जनो तेना निर्मल एवा यशने विस्तारे जे अने
SR No.010252
Book TitleJain Katha Ratna Kosh Part 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhimsinh Manek Shravak Mumbai
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1892
Total Pages517
LanguageHindi
ClassificationDictionary
File Size66 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy