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________________ (d जैनकथा रत्नकोप नाग सातमो. घर मोने, पांचमे ब्रह्म देवलोके देवता थया. त्यां दशो दिशे है का न्तिनो नद्योत करता, दश सागरनुं आयुष्य जोगवता, सुरनारी ज देवां गना तेनी साथें कीडा करता अदिप्त चित्तथका विचरे ने. त्यार पड़ी गुणसेना राणी साध्वीपणे शुद्ध चारित्र पाली, अनशन आराधन करी, ते पण गुनध्याने काल करी पांचमे ब्रह्मदेवलोकें तेज दे वताना मित्रपणे जइ उपज्यां. जेणे निरंतर तप संयम पडिवज्यां, तथा जेनी शीलनी लीला निर्मल ले, ते जीव शंखराजाना जीवनी पेठे नवो नवने विपे सुबोधलब्धि पामशे. ए कमलसेन राजाना सर्व व्रत चारित्रना लाननी कथा कही. इति पृथ्वीचंश्नां चरित्रने विषे लब्धि अंक एवे भामें बीजो सगें समाप्त थयो॥ २ ॥ इति श्रीहितीयसर्गे पृथ्वीचं अने गुणसागरना चरित्रना चार नवनो सं बंध संपूर्ण थयो॥ ॥अथ तृतीय सर्गस्य बालाववोध प्रारंनः॥ यथास्ति स्वस्तिसंपन्ने, तिलके नारत स्त्रियाः॥ शूरसेनानिधे देशे, सुस्थि रा मथुरा पुरी ॥ अर्थः-ते कमलसेन मुनिनो जीव, पांचमे देवलोके वीश सागरोपमनुं आयुष्य नोगवी, त्यांथीच्यवी जंबहीप नामें ही नरतत्रने विपे शूरसेननामा देशने विषे तिलक समान मथुरानामा नगरी .त्यां मेघ नामा राजानी मुक्तावली राणीनी कुखमां उत्पन्न थयो. हवे ते नगरी केवी ? तो के, त्यां दम तो एकमात्र देहराने विपेज ने ज्यां बंधन नारीना के शना अंबोडाने विपेज में, एटले नारीने चोटलाने बंधन ले, त्यां मात्र मार शब्द तो सारा लोको सोगताबाजी रमे, ते दावमां सोगाने जे मारे ने तेज मारने पण अन्यस्थानके नथी. कोइनो कर कालवो, तेतो विवाह मां वरकन्या परणे, त्यारेंज . बीजो को कोनो हाथ पकडतुं नही. स्ने हनी हानि ते तो दीपकने विषेज ; पण बीजा लोकने विषे स्नेह क्ष्य नथी. कणना देत्रविषे खल एवो शब्द , पण नगरने विषे कोई पण पुरुष खल नथी. अशुभ मणिने विषे त्रास दे, पण नगरने विषे कोइने त्रास नथी. ते पूर्वोक्त गुणयुक्त नगरीमा मेघनामें राजा राज्य करे , ते राजा रूपें करी कामदेव जेवो के. दाने कल्पम जेवो . पराक्रमें सिंह
SR No.010252
Book TitleJain Katha Ratna Kosh Part 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhimsinh Manek Shravak Mumbai
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1892
Total Pages517
LanguageHindi
ClassificationDictionary
File Size66 MB
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