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________________ ३५ विविध शिक्षाएं न य पावपरिक्खेवी, न य मित्तेसु कुप्पई । अप्पियस्सावि मित्तस्स, रहे कल्लाण भासई । -उत्तराध्ययन ११।१२ सुशिक्षित व्यक्ति न किसी पर दोषारोपण करता है, और न कभी परिचितों पर कुपित ही होता है । और तो क्या, मित्र के साथ मत भेद होने पर भी परोक्ष में उसकी भलाई की ही बात करता है। २. अठ्ठजुत्ताणि सिक्खिज्जा, निरट्ठाणि उ वज्जए । -उत्तराध्ययन ११८ अर्थयुक्त- सारभूत बातें ही ग्रहण कीजिए, निरर्थक बातें छोड़ दीजिए। ३. पुवकम्मखयट्ठाए, इमं देह समुद्धरे । -- उत्तराध्ययन ६।१४ पहले के किए हुए कर्मों को नष्ट करने के लिए इस देह की सारसम्भाल रखनी चाहिए। विहुणाहि रयं पूरे कडं। -उत्तराध्ययन १०३ पूर्व संचित कर्म रूपी रज को साफ कर ! किरिअंच रोयए धीरो। -उत्तराध्ययन १८१३३ धीर पुरुष सदा क्रिया (कर्तव्य) में ही रुचि रखते हैं । १२८
SR No.010229
Book TitleJain Dharm ki Hajar Shikshaye
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni
PublisherHajarimalmuni Smruti Granth Prakashan Samiti Byavar
Publication Year1973
Total Pages279
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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