________________
निर्वाण में जीवन का अन्त नहीं होता है अपितु यह जीवन काल में ही प्राप्त होता है और 'परिनिर्वाण' का अर्थ है मृत्यु के उपरान्त निर्वाण की प्राप्ति ।
४. चतुर्थ आर्य सत्य - चतुर्थ आर्य सत्य को 'दुःख निरोध गामिनी प्रतिपद' अर्थात् दुःख निरोध मार्ग कहा गया है । दुःख निरोध मार्ग को बुद्ध दर्शन में "अष्टांग मार्ग" कहा गया है। इस 'अष्टांगिक मार्ग' को बुद्ध ने 'मध्यमा प्रतिपद' कहा है। इस आर्य मार्ग के आठ अंक है- जो इस प्रकार है
१. सम्यक् दृष्टि,
२. सम्यक् संकल्प,
३. सम्यक् वाक्,
४. सम्यक् कर्मान्त,
५. सम्यक् आजीव,
६. सम्यक् व्यायाम,
७. सम्यक् स्मृति,
८. सम्यक् समाधि ।
बौद्ध धर्म अष्टांग मार्ग के अलावा त्रिरत्न को भी शील, समाधि और प्रज्ञा को निर्वाण प्राप्ति में अत्यन्त सहायक माना गया है। निर्वाण को पाली भाषा में 'निब्बान’ कहा गया है। ‘निर्वाण' का अर्थ है 'बुझा हुआ' । इससे आशय है कि निर्वाण की स्थिति में विविध वासनाओं की अग्नि बुझ जाती है तथा मनुष्य के स्वभावगत लोभ, घृणा, क्रोध तथा भ्रम की अग्नि शान्त हो जाती है ।
बौद्ध दर्शन में आत्मा को स्थायी न मानकर परिवर्तनशील माना गया है । बुद्ध ने शाश्वत आत्मा का निषेध इन शब्दों में किया है- 'विश्व में न कोई आत्मा और न आत्मा की तरह कोई अन्य वस्तु है । आत्मा विज्ञान का प्रवाह है । बुद्ध का आत्मा सम्बन्धी विचार से अलग है। महात्माबुद्ध ने नित्य आत्मा की सत्ता का निषेध किया है । पुनर्जन्म से तात्पर्य है विज्ञान प्रवाह की अविच्छिन्नता है । जब एक विज्ञान प्रवाह का अन्तिम विज्ञान समाप्त हो जाता है तब अन्तिम विज्ञान का विनाश हो जाता है फिर एक नये शरीर में एक नये विज्ञान का प्रादुर्भाव होता है इसी को बुद्ध ने 'पुनर्जन्म' कहा है ।
70