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प्रो० हरेन्द्र प्रताप सिंह ने अपनी पुस्तक 'भारतीय दर्शन की रूपरेखा' में लिखा है कि “कर्म सिद्धान्त का अर्थ है जैसा हम बोते है वैसा ही हम काटते हैं। इस नियम के अनुकूल शुभ कर्मों का फल शुभ तथा अशुभ कर्मों का फल अशुभ होता है। इसके अनुसार 'कृतप्रणाश' अर्थात किये हुए कर्मों का फल नष्ट नहीं होता है तथा 'अकृताभ्युगम्' अर्थात बिना किये हुए कर्मों के फल भी नहीं प्राप्त होते हैं। हमें सदा कर्मों के फल प्राप्त होतें हैं । सुख और दुःख क्रमशः शुभ और अशुभ कर्मों के अनिवार्य फल माने गये हैं । इस प्रकार कर्म सिद्धान्त 'कारण नियम' हैं। जो नैतिकता के क्षेत्र में काम करता है । "" कर्म तीन प्रकार के माने गये हैं
१. संचित कर्म - उस कर्म को कहते हैं जो अतीत कर्मों सें उत्पन्न होता है परन्तु जिसका फल मिलना अभी बाकी है अतः इसका संबंध अतीत जीवन से है ।
२. प्रारब्ध कर्म - वह कर्म है जिसका फल मिलना शुरू हो गया है, इसका संबंध अतीत जीवन से है ।
३. संचीयमान कर्म- इन्हें क्रियमाण कर्म भी कहते है । ये वे कर्म है जिन्हे व्यक्ति वर्तमान समय में करता है संचीयमान कर्म ही भविष्य में प्रारब्ध एवं संचित कर्म बनते हैं ।
समान्यतः यह मान्यता है कि तत्त्व ज्ञान से संचित कर्म का क्षय होता है और क्रियमाण कर्म का निवास होता है । परन्तु तत्त्व ज्ञान से प्रारब्ध कर्म का निवारण नहीं किया जा सकता है। प्रारब्ध कर्मों का विनाश उसके भोग संपादन क्रिया से ही होता है। यह क्रिया ‘कुलालचक्रवत' ही होती है।
. आरतीय दर्शन की एक विशेषता 'ऋत के नियम में विश्वास भी है।' भारतीय दर्शन के अनुसार जिस प्रकार मानवीय जगत में नैतिक व्यवस्था है उसी प्रकार भौतिक जगत में भी एक प्रकार की कल्पना की गयी है। भौतिक जगत में इस प्रकार की
1 हरेन्द्र प्रताप सिन्हा- भारतीय दर्शन की रूपरेखा । पृ० -१५-१६
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