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सम्पन्न होता है जो भारतीय दार्शनिकों ने इस प्रकार तालिका के माध्यम से भ्रमवादियों के मत में ऐसे स्थल में विशेष्य- विशेषण के बाधित सम्बन्ध को विषय करने वाले भ्रम से उत्पन्न होता है ।
ज्ञान.
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प्रामाण्य
स्वतः - मीमांसा, वेदान्त, सांख्य योग
परतः - न्याय बौद्ध
स्वतः- बौद्ध
अप्रामाण्य →→ परतः - न्याय, मीमांसा, वेदान्त, सांख्य- योग
मीमांसक स्वतः प्रामाण्यवाद को मानते हैं । ज्ञान स्वतः प्रमाण होता है। प्रभाकर और कुमारिल दोनों स्वतः प्रामाण्य वादी हैं । इनके अनुसार ज्ञान का प्रामाण्य बाहर से नहीं आता और ज्ञान की प्रामाणिकता को अन्य ज्ञान से सिद्ध नहीं किया जा सकता है। प्रभाकर के अनुसार 'स्वतः' का अर्थ ज्ञान जनक सामग्री से है। इस प्रकार प्रभाकर का मानना है कि ज्ञान स्वयं प्रकाश है अर्थात् ज्ञान जिस सामग्री से उत्पन्न होता है उसी से उस ज्ञान का तथा उसके प्रामाण्य का ज्ञान होता है तथा प्रत्येक ज्ञान अपने स्वरूप, अपने विषय, और अपने आश्रयभूत ज्ञाता इस त्रिपुटी को विषय करता है।
कुमारिल भट्ट का मानना है कि ज्ञान अतीन्द्रिय है उसका प्रत्यक्ष नहीं होता किन्तु ज्ञान से विषय के उपर ज्ञातता नामक धर्म की उत्पत्ति होती है। मीमांसक यह मानते हैं कि प्रामाण्य की उत्पत्ति और प्रमाण्य का ज्ञान दोनों स्वतः होते हैं। ज्ञान का प्रामाण्य और इस प्रामाण्य का ज्ञान दोनों ज्ञान के साथ ही उदित होता है और उसी सामग्री से उत्पन्न होते हैं जिससे ज्ञान उत्पन्न होता है ।' मीमांसकों का मानना है कि ज्ञान का अप्रामाण्य परतः होता है और बाहर से अनुमान किया जाता है । इस प्रकार मीमांसक जहां स्वतः प्रामाण्यवादी हैं वहां नैयायिक परतः प्रामाण्यवादी हैं। 'अप्रामाण्य'
प्रामाण्य स्वतः उत्पद्यते स्वतः ज्ञायते च । उत्पत्तौ स्वतः प्रामाण्यं ज्ञपतौ च स्वतः प्रामाण्यम् ।। सी०डी० शर्मा भारतीय दर्शन, पृष्ठ १६१ ।
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