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________________ जैन पूजा पाठ मह गाथा - दुद्धहि जिणवर जो पहवई मुत्ताहलधवलेण । सो संसार न संभवइ मुच्चड़ पावलेण ॥ अभिषेक मन्त्र मे 'जलेनाभिपिचे' की जगह 'क्षीरेणाभिपिचे' पढें । इति दुग्ध कलशाभिषेक | पीछे 'उदकचन्दनादि' बोल कर अर्ध चढावें । दुग्धान्धिवी चिपय संचितफेनराशिपाण्डुत्वकान्तिमत्रधारयतामतीव । दध्ना गता जिनपतेः प्रतिमा सुधारा, सम्पाद्यतां सपदि वांछित सिद्धये नः । गाथा - दुद्धरूडाकड उत्तरइ दडवडदहीपडन्त | भवियह सुच्चइ कलिमलह जिणदिट्ठ उवीसन्त ॥ मन्त्र में 'जलेनाभिपिचे' की जगह 'दना' पढें । इति दधिकलशाभिषेक । पीछे 'उदकचन्दनादि' बोल कर अर्घ चटाना चाहिये । भक्त्याललाट तट देशनिवेशितोच्चैः, हस्तैश्च्युता सुरवराऽसुरमर्त्यनाथैः । तत्कालपीलितमहेक्षुरसस्य धारा. सद्यः पुनातु जिनविश्वगतैव युष्मान् ॥ २२८ मन्त्र में 'जलेनाभिषिंचे' की जगह 'इक्षुरसेनाभिर्पिचे' पढें । पीछे "उदकचन्दन” बोल कर अर्घ चढाना चाहिये । संस्नापितस्य घृतदुग्धदधीक्षुवाहैः सर्वाभिरौषधिभिरर्हतमुज्ज्वलाभिः । उद्वर्तितस्य विदधाम्यभिषेकमेलाका लेय कुंकुमरसोत्कटबारिपूरैः ॥ गाथा - रसदुद्धदही पाणीय जो जिनवर पहावे । raine तोडे विकरि अचल सुक्ख पावइ | मन्त्र में 'जलेनाभिषिंचे' की जगह 'सर्वोषधेनाभिषिचे' पढें । इति सर्वोषधिकलशाभिषेक । पीछे 'उदकचन्दनादि' बोल कर अर्घ चढाना । "
SR No.010139
Book TitleSanatkumar Chavda Punyasmruti Granth
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages664
LanguageHindi
ClassificationSmruti_Granth
File Size21 MB
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