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________________ १५० ] [ ★ जैन निवन्ध रत्नावली भाग २ परब्रह्म, सर्वज्ञ, ईश, सिद्ध इत्यादि नामो से पुकारे जाते हैं । ऐसे मिद्ध जीव वहां अगणित पहुंच चुके है और आगे भी पहुचते रहेंगे । यह स्थान सृष्टि का ऊपरी आखिरी स्थान ह । इससे ऊपर अलोक है, जहाँ एकमात्र आकाश के मिवा अन्य कोई पदार्थ नही है । उस प्रकार हमने यहाँ जोवो के आवागमन के स्थानो का जैन मतानुसार सक्षिप्त वर्णन किया है। जैनशास्त्रो मे इस विषय का बहुत विस्तार से विवेचन | जैनकथाग्रन्थो मे ऐसी बहुत सी कथाएँ लिखी है, जिनमें जीवों के अनेक भवान्तरों का वर्णन किया गया है । 1
SR No.010107
Book TitleJain Nibandh Ratnavali 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMilapchand Katariya
PublisherBharatiya Digambar Jain Sahitya
Publication Year1990
Total Pages685
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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