SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 323
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ समन्तभद्रका समय और न० के. वी. पाठक 316 हो सकता कि पूज्यपाद समन्तभद्रसे पहले हुए है। यदि लक्ष्मीधरके द्वारा उल्लेखित होने मात्रसे ही उन्हें समन्तभद्रसे पहलेका विद्वान् माना जायगा नो विद्यानन्दको भी समन्तभद्रसे पहलेका विद्वान् मानना होगा, और यह स्पष्ट ही पाठकजीके, इतिहासके तया विद्यानन्दके उस उपलब्ध माहित्यके विरुद्ध पडेगा, जिममें जगह जगह पर ममन्तभद्रका और उनके बहुत पीछे होनेवाले प्रकमकदेवका नया दोनोंके वाक्योंका भी उल्लेख किया गया है। यहाँ में इतना मोर भी बताना देना चाहता है कि उपलब्ध जनमाहिन्यमें पूज्यपाद ममन्तभद्रमे बाटके विद्वान् मान गये है। पट्टावालियोंको छोड़कर श्रवणबेलगोल के शिलालेखोंमें भी एमा ही प्रतिपादित होना है। मिलानेख नं. 40 (4 ) में ममन्न महके परिचय-गायक बाद "न: मन्द लिम्वकर 'यो देवनन्दी प्रथमाभिधान:' इत्यादि पद्यों के द्वारा पूज्यपादका परिचय दिया है, और न. 18.5 के मिलानेमम ममन्नमद्रक बाद प्रज्यपादके परिनयका मा प्रथम पत्र दिया है उसी तन का प्रयोग किया है। इम नर पर यादो ममन्नभद्र बारका विद्वान गनित किया है। इसके मिवाय, बुद्ध पूज्यपादक द्रव्याकरणम ममन्तभद्रय! नामाल करने वाला एक मूव निम्न प्रकार में पाया जाता है "चतुष्यं ममन्नभद्रम्य।" 5-5-16% इम मूत्रको मोजूदगीमें यह नहीं कहा जामकता कि ममन्तभद्र पूज्यपादके बाद दुग है, और मी लिए पाठकोमा म मूषकी चिन्ना पंदा हुई, जिस. नं उन 3. निगयो मागमे पर भारी कठिनाई ( difficulty ) उपस्थित कर दी। इस कठिनाईम महाजमे ही पार पानेके लिए पाठकजीन इम मूत्रका तथा इसी प्रकारके मरे नामोरे बवाना मूत्रोको भी-अंपक करार देने की ओटा की वह व्यर्थ की कल्पना नया वीचातानीक (सबाय पौर कुछ प्रतीत नही होती। पापकी इम कल्पनाका एकमात्र प्राधार साकटायम व्याकरणमे, जिम मापने जने। व्याकरणक बहुतसे सूत्रोंको नकल (copy) करनेवाला बतलाया है, उक्त मूत्रका प्रपया उसी पारायके दूसरे समान मूत्रका न होना है। पर इसमे पापका ऐसा माशय तपा अनुमान जान पड़ता है कि
SR No.010050
Book TitleJain Sahitya aur Itihas par Vishad Prakash 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1956
Total Pages280
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy