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________________ 294 जैनदर्शन बौद्धोंके मतमें प्रमाण-फलव्यवहार, व्यवस्थाप्य-व्यवस्थापक दृष्टिसे है, जबकि नैयायिक आदिके मतमें यह व्यवहार कार्यकारण-भाव-निमित्तक है और जैन परम्परामें इस व्यवहारका आधार परिणामपरिणामीभाव है / पूर्वज्ञान स्वयं उत्तरज्ञान रूपसे परिणत होकर फल बन जाता है। एक आत्मद्रव्यकी ही ज्ञान पर्यायोंमें यह प्रमाणफलभावकी व्यवस्था अपेक्षाभेदसे सम्भव होती है। यदि प्रमाण और फलका सर्वथा अभेद माना जाता है तो उनमें एक व्यवस्थाप्य और दूसरा व्यवस्थापक, एक प्रमाण और दूसरा फल यह भेदव्यवहार नहीं हो सकता। सर्वथा भेद मानने पर आत्मान्तरके प्रमाणके साथ आत्मान्तरके फलमें भी प्रमाण-फल व्यवहार नहीं हो सकेगा। अचेतन इन्द्रियादिके साथ चेतन ज्ञानमें प्रमाणफल व्यवहार तो प्रतीतिविरुद्ध है। जिसे' प्रमाण उत्पन्न होता है, उसीका अज्ञान हटता है, वही अहितको छोड़ता है, हितका उपादान करता है और उपेक्षा करता है / इस तरह एक अनुस्यूत आत्माकी दृष्टिसे ही प्रमाण और फलमें कथञ्चित् अभेद कहा जा सकता है। आत्मा प्रमाता है, उसका अर्थपरिच्छित्तिमें साधकतम रूपसे व्याप्रियमाण स्वरूप प्रमाण है, तथा व्यापार प्रमिति है। इस प्रकार पर्यायकी दृष्टिसे उनमें भेद है। प्रमाणाभास : ऊपर जिन प्रमाणोंकी चर्चा की गई है, उनके लक्षण जिसमें न पाये जाँय, पर जो उनकी तरह प्रतिभासित हों वे सब प्रमाणाभास हैं / यद्यपि उक्त विवेचनसे पता लग जाता है कि कौन-कौन प्रमाणाभास हैं, फिर भी इस प्रकरणमें उनका स्पष्ट और संयुक्तिक विवेचन करना अपेक्षित है। ___ अस्वसंवेदी ज्ञान, निर्विकल्पक दर्शन, संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय आदि प्रमाणाभास हैं; क्योंकि इनके द्वारा प्रवृत्तिके विषयका यथार्थ उपदर्शन नहीं होता / जो अस्वसंवेदी ज्ञान अपने स्वरूपको ही नहीं जानता वह पुरुषान्तरके ज्ञानकी तरह हमें अर्थबोध कैसे करा सकता है ? निर्विकल्पक दर्शन संव्यवहारानुपयोगी होनेके कारण प्रमाणकी कक्षामें शामिल नहीं किया जाता। वस्तुतः जब ज्ञानको प्रमाण माना है तब प्रमाण और प्रमाणाभासकी चिन्ता भी ज्ञानके क्षेत्रमें ही की जानी चाहिये / बौद्धमतमें शब्दयोजनाके पहलेवाले ज्ञानको या शब्दसंसर्गकी योग्यता न रखनेवाले जिस ज्ञानको निर्विकल्पक दर्शन शब्दसे कहा है, उस संव्यवहारानुपयोगी 1. 'यः प्रमिमीते स एव निवृत्ताज्ञानी जहात्यादत्त उपेक्षते चेति प्रतीतेः / ' -परीक्षामुख 5 / 3 / 2. 'अस्वसंविदितगृहीतार्थदर्शनसंशयादयः प्रमाणाभासाः।' -परीक्षामुख 6 / 2 / Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010044
Book TitleJain Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahendramuni
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages174
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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