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________________ प्रमाणमीमांसा 247 वर्तमान रसको पूर्व रस उपादानभावसे तथा पूर्वरूप निमित्तभावसे उत्पन्न करता है और पूर्वरूप अपने उत्तररूपको पैदा करके ही रसमें निमित्त बनता है। अतः रसको चखकर उसकी एकसामग्रीका अनुमान होता है। फिर एकसामग्रीके अनुमानसे जो उत्तर रूपका अनुमान किया जाता है वह कारणसे कार्यका ही अनुमान है / इसे स्वभावहेतुमें अन्तर्भूत नहीं किया जा सकता। कारणसे कार्यके अनुमानमें दो शर्ते आवश्यक है। एक तो उस कारणकी शक्तिका किसी प्रतिबन्धकसे प्रतिरोध न हो और दूसरे सामग्री की विकलता न हो। इन दो बातोंका निश्चय होने पर ही कारण कार्यका अव्यभिचारी अनुमान करा सकता है। जहाँ इनका निश्चय न हो, वहाँ न सही; पर जिस कारणके सम्बन्धमें इनका निश्चय करना शक्य है, उस कारणको हेतु स्वीकार करनेमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये / पूर्वचर, उत्तरचर, सहचर हेतु : ____ इसी तरह 'पूर्वचर और उत्तरचर हेतुओंमें न तो तादात्म्य सम्बन्ध पाया जाता है और न तदुत्पत्ति ही; क्योंकि कालका व्यवधान रहने पर इन दोनों सम्बन्धोंकी सम्भावना नहीं है / अतः इन्हें भी पृथक् हेतु स्वीकार करना चाहिये / आज हुए अपशकुनको कालान्तरमें होनेवाले मरणका कार्य मानना तथा अतीत जागृत अवस्थाके ज्ञानको प्रबोधकालीन ज्ञानके प्रति कारण मानना उचित नहीं है। क्योंकि कार्यकी उत्पत्ति कारणके व्यापारके अधीन होती है। जो कारण अतीत और अनुत्पन्न होनेके कारण स्वयं असत् हैं, अत एव व्यापारशून्य हैं; उनसे कार्योत्पत्तिकी सम्भावना कैसे की जा सकती है ? इसी तरह सहचारी पदार्थ एक साथ उत्पन्न होते हैं, अतः वे परस्पर कार्यकारणभूत नहीं कहे जा सकते और एक अपनी स्थितिमें दूसरेको अपेक्षा नहीं करता, अतः उनमें परस्पर तादात्म्य भी नहीं माना जा सकता। इसलिए सहचर हेतुको भी पृथक् मानना ही चाहिये। हेतु के भेद : विधिसाधक उपलब्धिको अविरुद्धोपलब्धि और प्रतिषेध-साधक उपलब्धिको विरुद्धोपलब्धि कहते हैं / इनके उदाहरण इस प्रकार हैं: (1) अविरुद्धव्याप्योपलब्धि-शब्द परिणामी है, क्योंकि वह कृतक है। (2) अविरुद्धकार्योपलब्धि-इस प्राणीमें बुद्धि है, क्योंकि वचन आदि देखे जाते हैं। 1. देखो, लघीय० श्लो० 14 / परीक्षामुख 3 / 56-58 / 2. परीक्षामुख 359 / 3. परीक्षामुख 3 / 60-65 / Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010044
Book TitleJain Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahendramuni
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages174
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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