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________________ 240 जैनदर्शन जब बौद्धका यह कहना है कि 'समर्थनके बिना हेतु निरर्थक है'; तब अच्छा तो यही है कि समर्थनको ही अनुमानका अवयव माना जाय, हेतु तो समर्थनके कहनेसे स्वतः गम्य हो जायेगा। 'हेतुके बिना कहे किसका समर्थन ?' यह समाधान पक्षप्रयोगमें भी लागू होता है, 'पक्षके बिना किसकी सिद्धिके लिये हेतु ?' या 'पक्षके बिना हेतु रहेगा कहाँ ?' अतः प्रस्ताव आदिके द्वारा पक्ष भले ही गम्यमान हो, पर वादीको वादकथामें अपना पक्ष-स्थापन करना ही होगा, अन्यथा पक्षप्रतिपक्षका विभाग कैसे किया जायेगा ? यदि हेतुको कहकर आप समर्थनकी सार्थकता मानते हैं; तो पक्षको कहकर ही हेतुप्रयोगको न्याय्य मानना चाहिये / अतः जब “साधनवचनरूप हेतु और पक्षवचनरूप प्रतिज्ञा इन दो अवयवोंसे ही परिपूर्ण अर्थका बोध हो जाता है तब अन्य दृष्टान्त, उपनय और निगमन वादकथामें व्यर्थ हैं। उदाहरणको व्यर्थताः 2 उदाहरण साध्यप्रतिपत्तिमें कारण तो इसलिये नहीं है कि अविनाभावी साधनसे ही साध्यकी सिद्धि हो जाती है। विपक्षमें बाधक प्रमाण मिल जानेसे व्याप्तिका निश्चय भी हो जाता है; अतः व्याप्तिनिश्चयके लिये भी उसकी उपयोगिता नहीं है। फिर दृष्टान्त किसी खास व्यक्तिका होता है और व्याप्ति होती है सामान्यरूप / अतः यदि उस दृष्टान्तमें विवाद उत्पन्न हो जाय तो अन्य दृष्टान्त उपस्थित करना होगा, और इस तरह अनवस्था दूषण आता है। यदि केवल दृष्टान्तका कथन कर दिया जाय तो साध्यधर्मीमें साध्य और साधन दोनोंके सद्भावमें शंका उत्पन्न हो जाती है / अन्यथा उपनय और निगमनका प्रयोग क्यों किया जाता है ? व्याप्तिस्मरणके लिए भी उदाहरणकी सार्थकता नहीं है; क्योंकि अविनाभावी हेतुके प्रयोगमात्रसे ही व्याप्तिका स्मरण हो जाता है। सबसे खास बात तो यह है कि विभिन्न मतवादी तत्त्वका स्वरूप विभिन्नरूपसे स्वीकार करते हैं। बौद्ध घड़ेको क्षणिक कहते हैं, जैन कथञ्चित् क्षणिक और नैयायिक अवयवीको अनित्य और परमाणुओंको नित्य / ऐसी दशामें किसी सर्वसम्मत दृष्टान्तका मिलना कठिन है। अतः जैन तार्किकोंने इसके झगड़ेको ही हटा दिया है। दूसरी बात यह है कि दृष्टान्तमें व्याप्तिका ग्रहण करना अनिवार्य भी नहीं है; क्योंकि जब समस्त वस्तुओंको पक्ष बना लिया जाता है तब किसी दृष्टान्तका मिलना असम्भव हो जाता है। अन्ततः पक्षमें ही साध्य और साधनकी व्याप्ति विपक्षमें बाधक प्रमाण देखकर सिद्ध कर ली जाती है। इसलिए भी दृष्टान्त निरर्थक हो जाता है और वादकथामें 1. परीक्षामुख // 32 / 2. परीक्षामुख 3 / 33-40 / Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010044
Book TitleJain Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahendramuni
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages174
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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