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________________ 214 जैनदर्शन ____ तात्पर्य यह कि जहाँ कुमारिलने प्रत्यक्षसे धर्मज्ञताका निषेध करके धर्मके विषयमें वेदका ही अव्याहत अधिकार स्वीकार किया है, वहाँ धर्मकोतिने प्रत्यक्षसे ही धर्म-मोक्षमार्गका साक्षात्कार मानकर प्रत्यक्षके द्वारा होनेवाली धर्मज्ञताका जोरोंसे सर्मथन किया है। धर्मकीतिके टीकाकार प्रज्ञाकरगुप्तने सुगतको धर्मज्ञके साथ-ही-साथ सर्वज्ञत्रिकालवर्ती यावत्पदार्थों का ज्ञाता-भी सिद्ध किया है और लिखा है कि सुगतकी तरह अन्य योगी भी सर्वज्ञ हो सकते हैं यदि वे अपनी साधक अवस्थामें रागादिनिर्मुक्तिकी तरह सर्वज्ञताके लिए भी यत्न करें। जिनने वीतरागता प्राप्त कर ली है, वे चाहें तो थोड़ेसे प्रयत्नसे ही सर्वज्ञ बन सकते हैं। आ० शान्तरक्षित भी इसी तरह धर्मज्ञतासाधनके साथ ही साथ सर्वज्ञता सिद्ध करते हैं और सर्वज्ञताको वे शक्तिरूपसे सभी वीतरागोंमें मानते हैं। कोई भी वीतराग जब चाहे तब जिस किसी भी वस्तुका साक्षात्कार कर सकता है। योगदर्शन और वैशेषिक दर्शनमें यह सर्वज्ञता अणिमा आदि ऋद्धियोंकी तरह एक विभूति है, जो सभी वीतरागोंके लिए अवश्य ही प्राप्तव्य नहीं है। हाँ, जो इसकी साधना करेगा उसे यह प्राप्त हो सकती है। जैन दार्शनिकोंने प्रारम्भसे ही त्रिकाल-त्रिलोकवर्ती यावत्ज्ञेयोंके प्रत्यक्षदर्शनके अर्थमें सर्वज्ञता मानी है और उसका समर्थन भी किया है। यद्यपि तर्कयुगसे पहले “जे एगे जाणइ से सव्वे जाणइ" [ आचा० सू० 1 / 23 ]-जो 1. 'ततोऽस्य वीतरागत्वे सर्वार्थानसंभवः / समाहितस्य सकलं चकास्तीति विनिश्चितम् // सर्वेषां वीतरागाणामेतत् करमान्न विद्यते ? रागादिक्षयमाने हि तैर्यत्नस्य प्रवर्तनात् // पुनः कालान्तरे तेषां सर्वज्ञगुणरागिणाम् / अल्पयत्नेन सर्वशत्वस्य सिद्धिरवारिता // ___-प्रमाणवार्तिकालं० पृ० 326 / 2. 'यद्यदिच्छति बोर्बु वा तत्तद्वेत्ति नियोगतः / शक्तिरेवंविधा तस्य प्रहोणावरणो ह्यसौ।' -तत्त्वसं० का० 3328 / 3. 'सई भगवं उप्पण्णणाणदरिसी सव्वलोए सबजीवे सव्वभावे सम्म समं जाणादि पस्सदि विहरदित्ति।' -पट्खं० पयडि० सू० 78 / ‘से भगवं अरहं जिणे केवली सव्वन्नू सव्वभावदरिसी."सव्वलोए सव्वजीवाणं सव्वभावाई जाणमाणे पासमाणे एवं च णं विहरइ।' –आचा० 2 / 3 / पृ० 425 / Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010044
Book TitleJain Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahendramuni
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages174
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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