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________________ 200 . जैनदर्शन प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती / रह जाती है सजातीय प्रमाणान्तरके संप्लवकी बात, सो द्वितीय क्षणमें जब वह पदार्थ ही नहीं रहता, तब संप्लवकी चर्चा अपने आप ही समाप्त हो जाती है। __ जैन पदार्थको एकान्त क्षणिक न मानकर उसे कथञ्चित् अनित्य और सामान्यविशेषात्मक मानते हैं / यही पदार्थ सभी प्रमाणोंका विषय होता है। वस्तु अनन्तधर्मवाली है। अमुक ज्ञानके द्वारा वस्तुके अमुक अंशोंका निश्चय होने पर भी अगृहीत अंशोंको जाननेके लिये प्रमाणान्तरको अवकाश है ही। इसी तरह जिन ज्ञात अंशोंका संवाद हो जानेसे निश्चय हो चुका है उन अंशोंमें भले ही प्रमाणान्तर कुछ विशेष परिच्छेद न करें। पर जिन अंशोंमें असंवाद होनेके कारण अनिश्चय या विपरीत निश्चय है, उनका निश्चय करके तो प्रमाणान्तर विशेषपरिच्छेद होनेसे प्रमाण ही होता है। अकलंकदेवने प्रमाणके लक्षणमें 'अनधिगतार्थग्राही' पद दिया है, अतः अनिश्चित अंशके निश्चयमें या निश्चितांशमें उपयोगविशेष होनेपर ही प्रमाणसंप्लव स्वीकार किया जाता है, जब कि नैयायिकने प्रमाणके लक्षणमें ऐसा कोई पद नहीं रखा है, अतः उसकी दृष्टिसे वस्तु गृहीत हो या अगृहीत, यदि इन्द्रियादि कारणकलाप मिलते हैं तो प्रमाणकी प्रवृत्ति अवश्य ही होगी। उपयोगविशेष हो या न हो, कोई भी ज्ञान इसलिए अप्रमाण नहीं हो सकता कि उसने गृहीतको ग्रहण किया है। तात्पर्य यह कि नैयायिकको प्रत्येक अवस्थामें प्रमाणसंप्लव स्वीकृत है। जैन परम्परामें अवग्रहादि ज्ञानोंके ध्रुव और अध्रुव भेद भी किये हैं। ध्रुवका अर्थ है जैसा ज्ञान पहले होता है वैसा ही बाद में होना / ये ध्रुवावग्रहादि प्रमाण भी है। अतः सिद्धान्तदृष्टिसे जैन अपने नित्यानित्य पदार्थमें सजातीय या विजातीय प्रमाणोंकी प्रवृत्ति और संवादके आधारसे उनकी प्रमाणताको स्वीकार करते ही हैं / जहाँ विशेषपरिच्छेद होता है वहाँ तो प्रमाणता है ही, पर जहाँ विशेषपरिच्छेद नहीं भी हो, पर यदि संवाद है तो प्रमाणताको कोई नहीं रोक सकता। यद्यपि कहीं गृहीतग्राही ज्ञानको प्रमाणाभासमें गिनाया है, पर ऐसा प्रमाणके लक्षणमें 'अपूर्वार्थ' पद या 'अनधिगत' विशेषण देनेके कारण हुआ है। वस्तुतः ज्ञानकी प्रमाणताका आधार अविसंवाद या सम्यग्ज्ञानत्व ही है; अपूर्वार्थाहित्व नहीं / पदार्थके नित्यानित्य होनेके कारण उसमें अनेक प्रमाणोंकी प्रवृत्तिका पूरा-पूरा अवसर है। 1. 'उपयोगविशेषस्याभावे प्रमाणसंप्लवानभ्युपगमात् // ' -अष्टसह० पृ०४। 2. परीक्षामुख 6 / 1 / Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010044
Book TitleJain Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahendramuni
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages174
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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