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जीवाजीवाभिगम - ३ / द्वीप./१६९
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और लोमहस्तक चंगेरियाँ भी दो-दो हैं । ये सब सर्वरत्नमय हैं, स्वच्छ हैं यावत् प्रतिरूप हैं। उन तोरणों के आगे दो-दो पुष्प-पटल यावत् दो-दो लोमहस्त-पटल कहे गये हैं, जो सर्वरत्नमय हैं यावत् प्रतिरूप हैं ।
उन तोरणों के आगे दो-दो सिंहासन हैं । यावत् वे प्रासादीय, दर्शनीय, अभिरूप और प्रतिरूप हैं । उन तोरणों के आगे चांदी के आच्छादनवाले छत्र हैं । उन छत्रों के दण्ड वैडूर्यमणि के हैं, चमकीले और निर्मल हैं, उनकी कर्णिका स्वर्ण की है, उनकी संधियां वज्ररत्न से पूरित हैं, वे छत्र मोतियों की मालाओं से युक्त हैं । एक हजार आठ शलाकाओं से युक्त हैं, जो श्रेष्ठ स्वर्ण की बनी हैं । कपड़े से छने हुए चन्दन की गंध के समान सुगन्धित और सर्वऋतुओं में सुगन्धित रहने वाली उनकी शीतल छाया है । उन छत्रों पर नाना प्रकार के मंगल चित्रित हैं और वे चन्द्रमा के आकार के समान गोल हैं । उन तोरणों के आगे दो-दो चामर कहे गये हैं । वे चामर चन्द्रकान्तमणि, वज्रमणि, वैडूर्यमणि आदि नाना मणिरत्नों से जति दण्डवाले हैं । वे चामर शंख, अंकरत्न कुंद, दगरज, अमृत, के मथित फेनपुंज के समान श्वेत हैं, सूक्ष्म और रजत के लम्बे-लम्बे बाल वाले हैं, सर्वरत्नमय हैं, स्वच्छ हैं, यावत् प्रतिरूप हैं ।
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उन तोरणों के आगे दो-दो तैलसमुद्गक, कोष्टसमुद्गक, पत्रसमुद्गक, चोयसमुद्गक, तगरसमुद्गक, इलायचीसमुद्गक, हरितालसमुद्गक, हिंगुलुसमुद्गक, मनःशिलासमुद्गक और अंजनसमुद्गक हैं । ये सर्व समुद्गक सर्वरत्नमय हैं स्वच्छ हैं यावत् प्रतिरूप हैं ।
[१७०] उस विजयद्वार पर १०८-१०८ चक्र से, मृग से, गरुड से, रुरु से, छत्रांकित, पिच्छ से, शकुनि से, सिंह से, वृषभ से, सफेद चार दांत वाले हाथी से अंकित ध्वजाएँ - इस प्रकार आगे-पीछे सब मिलाकर एक हजार अस्सी ध्वजाएँ विजयद्वार पर हैं ।
उस विजयद्वार के आगे नौ भौम हैं । इत्यादि यावत् मणियों के स्पर्श तक जानना । उन भौमों की भीतरी छत पर पद्मलता यावत् श्यामलताओं के विविध चित्र बने हुए हैं, यावत् वे स्वर्ण के हैं, स्वच्छ हैं यावत् प्रतिरूप हैं । उन भौमों के एकदम मध्यभाग में जो पांचवां भौम है उस के ठीक मध्यभाग में एक बड़ा सिंहासन है, उस सिंहासन के पश्चिम - उत्तर में, उत्तर में, उत्तर-पूर्व में विजयदेव के चार हजार सामानिक देवों के चार हजार भद्रासन हैं । पूर्व में विजयदेव की चार सपरिवार अग्रमहिषियों के चार भद्रासन हैं । दक्षिण-पूर्व में विजयदेव की आभ्यन्तर पर्षदा के आठ हजार देवों के आठ हजार भद्रासन हैं । दक्षिण में विजयदेव की मध्यम पर्षदा के दस हजार देवों के दस हजार भद्रासन हैं । दक्षिण-पश्चिम में विजयदेव की - पर्षद के बारह हजार देवों के बारह हजार भद्रासन हैं । पश्चिम में विजयदेव के सात अनीकाधिपतियों के सात भद्रासन हैं पूर्व में, दक्षिण में, पश्चिम में और उत्तर में विजयदेव के सोलह हजार आत्मरक्षक देवों के सोलह हजार सिंहासन हैं । शेष भौमों में प्रत्येक में भद्रासन कहे गये हैं ।
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[१७१] उस विजयद्वार का ऊपरी आकार सोलह प्रकार के रत्नों से उपशोभित है । जैसे वज्ररत्न, वैडूर्यरत्न यावत् रिष्टरत्न । उस विजयद्वार पर बहुत से आठ-आठ मंगलस्वस्तिक, श्रीवत्स यावत् दर्पण कहे गये हैं । ये सर्वरत्नमय स्वच्छ यावत् प्रतिरूप हैं । उस विजयद्वार के ऊपर बहुत से कृष्ण चामर के चिह्न से अंकित ध्वजाएँ हैं । यावत् वे ध्वजाएँ